Tum Se Tum Mein

Posted: सितम्बर 14, 2014 in Uncategorized

तुम से तुम में मिलने का,
प्रिये ! क्या तर्क रखा जाए,
जो मार्ग प्रवृत हैं लहरों का,
कहो कैसे अर्थ कहा जाए !!

अंतर-कण में, अंतर-तम में,
प्राप्य हमें, प्रिये ! हार हुआ,
प्रीत विवेक या प्रीत के भ्रम में,
जो प्रश्न उठे, धिक्कार हुआ !!

लक्ष्य-हीन हो पथ पर चलना,
हठ ये नहीं, एक प्रयोजनता हैं,
लक्ष्य हो, तो क्या सृजनता हैं ?,
स्वीकार नहीं तुम्हें, अनमनता हैं !!

अब अंत नहीं, जो शून्यता हैं,
इस जीवन में, जो न्यूनता हैं,
मिथ्या नहीं, ये दृष्टांत दिव्य हैं,
जीवन से ही जीवन बनता हैं !!

जब पुष्प बना, तो शूल रहा,
जब प्रणय बना, तो भूल रहा,
उस जीवन का सार ही क्या ?
जो अपूर्ण हुआ, तो पूर्ण रहा !!

-चन्द्र शेखर तिवारी

Kaanpura

Posted: अगस्त 31, 2014 in Uncategorized

कानपुरा (इंडियन ओसन):

उजड़ी रियासत लूटे सुल्तान,
अधमरी बुलबुल, आधी जान,
आधी सदी की आधी नदी में,
आधी सड़क पे पूरी शान !!

आधा-आधा जोड़ के बनता,
पूरा एक फितूरा,
और आधे बुझे चिराग के तल्ले,
पूरा कानपुरा !!

हटिया खुली, सराफा बंद,
ठाड़े रहो कलेक्टर-गंज,
बात-बात पे फैंटम बनना,
छोड़ो बैठ के मारो तंज !!

अरे अंगरेजन तो बिसर गए,
और गइया रोड पे पसर गयी,
अंडू-बकसई करते करते,
बची-खुची सब कसर गयी !!

कसर गयी और भसर मची हैं,
चाट के लाल धतूरा,
और आधे बुझे चिराग के तल्ले,
पूरा कानपुरा !!

जेब पे पैबंद, मिजाज़ सिकंदर,
ढेर मदारी, एक कलंदर,
हैं रुकी सी रेत घड़ी,
जादू की टूटी सी छड़ी !!

आगे देख के पीछे चलता,
शहर ये पूरा का पूरा,
और आधे बुझे चिराग के तल्ले,
पूरा कानपुरा,
भईया पूरा पटना पूरा,
अरे पूरा राँची पूरा भईया,
पूरा गोरखपुरा !!

-वरुण ग्रोवर

Ab Lehron Se Milne Jaanaa Hain

Posted: अगस्त 31, 2014 in Uncategorized

अब किनारों पर क्या पाना हैं,
अब लहरों से मिलने जाना हैं ।

स्पष्ट नहीं कुछ,
जहाँ जीवन हो तुच्छ,
हर नीति अवम,
जहाँ स्वार्थ ही हो उच्च,
कहाँ अंतर-मन का ठिकाना हैं,
अब लहरों से मिलने जाना हैं ।

अम्बर ऊँचा,
धरती निचा,
हर अंतर्मन में,
व्यतिक्रम खिंचा,
अब कर्मों का मूल्य चुकाना हैं,
अब लहरों से मिलने जाना हैं ।

अब मार्ग मिले,
या जल-जल ही रहे,
रेचन तन-मन,
चाहे लहरों में बहे,
जग के उद्गम का ये मुहाना हैं,
अब लहरों से मिलने जाना हैं ।

करे अर्चन,
भयभीत हो मन,
सृष्टि जिसकी,
उसे जीवन अर्पण,
इस नश्वर जग में किसे आना हैं,
अब लहरों से मिलने जाना हैं ।

अब किनारों पर क्या पाना हैं,
अब लहरों से मिलने जाना हैं । -चन्द्र शेखर तिवारी

Is Jahaan Mein

Posted: अगस्त 17, 2014 in Uncategorized

इस जहां में जो ताशीर हैं, हैं तेरे ही किरदार का,
खुदा न बन सका तो क्या, शहरयार हैं बाजार का॥

हर जवाब तेरा हैं लिखा, जो भी हैं तेरे सवाल का,
फिर भी खुदा का नाम ले, तू हाकिम हैं कमाल का ॥

कुश्त-ओ-खून ये फ़ुज़ूल हैं, जुबां से डर कर हम मरे,
अब इन्साफ क्या मिले हमें, तू जो कहे वो हम करे ॥

वो चाँद जो खिला था कल, वो भी दाग़-दार हो गया,
अब ज़मीं पर देखता नहीं, हो बे-दार फिर वो सो गया ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Koi Chirag Nahi

Posted: अगस्त 14, 2014 in Uncategorized

कोई चिराग नहीं है मगर उजाला है,
ग़जल की शाख पे इक फूल खिलने वाला है।

ग़जब की धूप है, एक बेलिवास पत्थर पर,
पहाड़ पर तेरी बरसात का दुशाला है।

अजीब लहज़ा है दुश्मन की मुस्कुराहट का,
कभी गिराया है मुझको कभी संभाला है।

निकल के पास की मास्जिद से एक बच्चे ने,
फ़साद में जली मूरत पे हार डाला है।

तमाम वादियों में सहरा में आग रौशन है,
मुझे खिज़ां के इन्हीं मौसमों ने पाला है। -बशीर बद्र

Neemat Hain Uski

Posted: जुलाई 27, 2014 in Uncategorized

कि नीमत हैं उसकी तो ये हालात कम हैं,
हमें अपनी नाकामियों से कहाँ कोई ग़म हैं,
नफरतों और जफ़ाओं के दैर-ओ-हरम हैं,
कहो किसके खुदा का क़यामत करम हैं ॥

चलो रूह-ओ-नज़र एक आइना तराशे,
करे नाशाद ये दिल हर हक़-आशना से,
शब-ओ-रोज़ इबादत करे अपने खुदा से,
फिर मुहब्बत से जी ले, फिर जी ले वफ़ा से ॥

अकबर हो या सिकंदर जहां सबसे छूटा,
कुछ मिट्टी के पुतलों ने मिट्टी को लूटा,
हुआ खून जाया वो अबदियत था झूठा,
तसलीम नहीं था कि मुकद्दर था फूटा ॥

कहो अब भी तुम्हें क्या आज़माना हैं बाकी,
कि और कितने छींटें लहू के छिपाना हैं बाकी,
कहाँ-कहाँ ज़ुल्म-ओ-हुकूमत चलाना हैं बाकी,
कि और क्या-क्या खुदा को दिखाना हैं बाकी ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Paaya To Kya Paaya

Posted: जुलाई 14, 2014 in Uncategorized

मैं सोच रहा, सिर पर अपार,
दिन, मास, वर्ष का धरे भार,
पल, प्रतिपल का अंबार लगा,
आखिर पाया तो क्या पाया?

जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा,
जब थाप पड़ी, पग डोल उठा,
औरों के स्वर में स्वर भर कर,
अब तक गाया तो क्या गाया?

सब लुटा विश्व को रंक हुआ,
रीता तब मेरा अंक हुआ,
दाता से फिर याचक बनकर,
कण-कण पाया तो क्या पाया?

जिस ओर उठी अंगुली जग की,
उस ओर मुड़ी गति भी पग की,
जग के अंचल से बंधा हुआ,
खिंचता आया तो क्या आया?

जो वर्तमान ने उगल दिया,
उसको भविष्य ने निगल लिया,
है ज्ञान, सत्य ही श्रेष्ठ किंतु,
जूठन खाया तो क्या खाया? – हरिशंकर परसाई