Hauslo Ke Tarz Par

Posted: मार्च 9, 2014 in Uncategorized

हौसलो के तर्ज़ पर, अब बेख़ौफ़ सांस लीजिये,
कि आप हैं तो हम भी हैं, एक इंकलाब कीजिये ॥

तलाशी गिरेहबान की, चाहे सौ दफा ले लीजिये,
हमारी भी ज़ुबान हैं, कुछ इस पर यकीन कीजिये ॥

मुनाफ़िक़ पसन्द ये सुने, आप रियाकारिया न कीजिये,
इंसानियत की नीव पर, अब अपनी राह मोड़ लीजिये ॥

समंदर में मिलेंगे रास्ते, ये कश्ती तो चलने दीजिये,
साहिल का जो भी हो पता, तूफ़ान से लड़ के लीजिये ॥

जब बेबाक हैं इरादे तो, आप उन्हें भी साथ लीजिये,
जो कटे-बटे हैं आज तक, उनके लौ को तेज कीजिये ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Jo Punya-Punya Bak Rahe

Posted: फ़रवरी 9, 2014 in Uncategorized

(परशुराम की प्रतीक्षा, खण्ड पांच के चुने अंश) :

जो पुण्य-पुण्य बक रहे, उन्हें बकने दो,
जैसे सदियाँ थक चुकीं, उन्हें थकने दो ।
पर, देख चुके हम तो सब पुण्य कमा कर,
सौभाग्य, मान, गौरव, अभिमान गवाँ कर ।

वे पियें शीत, तुम आतप-घाम पियो रे !
वे जपें नाम, तुम बन कर राम जियो रे !

सुर नहीं शान्ति आँसू बिखेर लायेंगे ;
मृग नहीं, युद्ध का शमन शेर लायेंगे ।
विनयी न विनय को लगा टेर लायेंगे,
लायेंगे तो वह दिन दिलेर लायेंगे ।

बोलती बन्द होगी पशु की जब भय से,
उतरेगी भू पर शान्ति छूट संशय से ।

वे देश शान्ति के सब से शत्रु प्रबल हैं,
जो बहुत बड़े होने पर भी दुर्बल हैं,
हैं जिनके उदर विशाल, बाँह छोटी हैं,
भोथरे दाँत, पर, जीभ बहुत मोटी हैं ।

औरों के पाले जो अलज्ज पलते हैं,
अथवा शेरों पर लदे हुए चलते हैं ।

सिंहों पर अपना अतुल भार मत डालो,
हाथियो ! स्वयं अपना तुम बोझ सँभालो ।
यदि लदे फिरे, यों ही, तो पछताओगे,
शव मात्र आप अपना तुम रह जाओगे ।

यह नहीं मात्र अपकीर्ति, अनय की अति हैं ।
जानें, कैसे सहती यह दृश्य प्रकृति हैं !

उद्देश्य जन्म का नहीं, कीर्ति या धन हैं,
सुख नहीं, धर्म भी नहीं, न तो दर्शन हैं ;
विज्ञान, ज्ञान-बल नहीं, न तो चिन्तन हैं,
जीवन का अंतिम ध्येय स्वयं जीवन हैं ।

सब से स्वतन्त्र यह रस जो अनघ पियेगा,
पूरा जीवन केवल वह वीर जियेगा ।

जीवन अपनी ज्वाला से आप ज्वलित हैं,
अपनी तरंग से आप समुद्वेलित हैं ।
तुम वृथा ज्योति के लिए कहाँ जाओगे ?
हैं जहाँ आग, आलोक वहीं पाओगे ।

क्या हुआ, पत्र यदि मृदुल, सुरम्य कली हैं ?
सब मृषा, तना तरु का यदि नहीं बली हैं ।

धन से मनुष्य का पाप उभर आता हैं,
निर्धन जीवन यदि हुआ, बिखर जाता हैं ।
कहते हैं जिसको सुयश-कीर्ति, सो क्या हैं ?
कानों की यदि गुदगुदी नहीं, तो क्या हैं ?

यश-अयश-चिन्तना भूल, स्थान पकड़ो रे !
यश नहीं, मात्र जीवन के लिए लड़ो रे !

कुछ समझ नहीं पड़ता, रहस्य यह क्या हैं !
जानें, भारत में बहती कौन हवा हैं !
गमले में हैं जो खड़े, सुरम्य-सुदल हैं,
मिट्टी पर के ही पेड़ दीन-दुर्बल हैं ।

जब तक हैं यह वैषम्य, समाज सड़ेगा,
किस तरह एक हो कर यह देश लड़ेगा ।

सब से पहले यह दुरित-मूल काटो रे !
समतल पीटो, खाइयाँ-खड्ड पाटो रे !
बहुपाद वटों की शिरा-सोर छाँटो रे !
जो मिले अमृत, सब को सामान बाँटो रे !

वैषम्य घोर जब तक यह शेष रहेगा,
दुर्बल का ही दुर्बल यह देश रहेगा ।

यह बड़े भाग्य की बात ! सिन्धु चंचल हैं,
मथ रहा आज फिर उसे मन्दराचल हैं ।
छोड़ता व्यग्र फूत्कार सर्प पल-पल हैं,
गर्जित तरंग, प्रज्वलित वाडवानल हैं ।

लो कढ़ा जहर ! संसार जला जाता हैं ।
ठहरो, ठहरो, पीयूष अभी आता हैं ।

पर, सावधान ! जा कहो उन्हें समझा कर,
सुर पुनः भाग जाये मत सुधा चुरा कर ।
जो कढ़ा अमृत, सम-अंश बाँट हम लेंगे,
इस बार जहर का भाग उन्हें भी देंगे ।

वैषम्य शेष यदि रहा, क्षान्ति डोलेगी,
इस रण पर चढ़ कर महा क्रान्ति बोलेगी । -रामधारी सिंह ‘दिनकर’

He Vir Bandhu

Posted: फ़रवरी 9, 2014 in Uncategorized

हे वीर बन्धु (परशुराम की प्रतीक्षा, खण्ड दो) :

हे वीर बन्धु ! दायी है कौन विपद का ?
हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का ?

यह गहन प्रश्न; कैसे रहस्य समझायें ?
दस-बीस वधिक हों तो हम नाम गिनायें।
पर, कदम-कदम पर यहाँ खड़ा पातक है,
हर तरफ लगाये घात खड़ा घातक है।

घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है,
लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है,
जिस पापी को गुण नहीं; गोत्र प्यारा है,
समझो, उसने ही हमें यहाँ मारा है।

जो सत्य जान कर भी न सत्य कहता है,
या किसी लोभ के विवश मूक रहता है,
उस कुटिल राजतन्त्री कदर्य को धिक् है,
यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं वधिक है।

चोरों के हैं जो हितू, ठगों के बल हैं,
जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं,
जो छल-प्रपंच, सब को प्रश्रय देते हैं,
या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं;

यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है,
भारत अपने घर में ही हार गया है।

है कौन यहाँ, कारण जो नहीं विपद् का ?
किस पर जिम्मा है नहीं हमारे वध का ?
जो चरम पाप है, हमें उसी की लत है,
दैहिक बल को रहता यह देश ग़लत है।

नेता निमग्न दिन-रात शान्ति-चिन्तन में,
कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में।
यज्ञाग्नि हिन्द में समिध नहीं पाती है,
पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है।

ओ बदनसीब अन्धो ! कमजोर अभागो ?
अब भी तो खोलो नयन, नींद से जागो।
वह अघी, बाहुबल का जो अपलापी है,
जिसकी ज्वाला बुझ गयी, वही पापी है।

जब तक प्रसन्न यह अनल, सुगुण हँसते है;
है जहाँ खड्ग, सब पुण्य वहीं बसते हैं।
वीरता जहाँ पर नहीं, पुण्य का क्षय है,
वीरता जहाँ पर नहीं, स्वार्थ की जय है।

तलवार पुण्य की सखी, धर्मपालक है,
लालच पर अंकुश कठिन, लोभ-सालक है।
असि छोड़, भीरु बन जहाँ धर्म सोता है,
पातक प्रचण्डतम वहीं प्रकट होता है।

तलवारें सोतीं जहाँ बन्द म्यानों में,
किस्मतें वहाँ सड़ती है तहखानों में।
बलिवेदी पर बालियाँ-नथें चढ़ती हैं,
सोने की ईंटें, मगर, नहीं कढ़ती हैं।

पूछो कुबेर से, कब सुवर्ण वे देंगे ?
यदि आज नहीं तो सुयश और कब लेंगे ?
तूफान उठेगा, प्रलय-वाण छूटेगा,
है जहाँ स्वर्ण, बम वहीं, स्यात्, फूटेगा।

जो करें, किन्तु, कंचन यह नहीं बचेगा,
शायद, सुवर्ण पर ही संहार मचेगा।
हम पर अपने पापों का बोझ न डालें,
कह दो सब से, अपना दायित्व सँभालें।

कह दो प्रपंचकारी, कपटी, जाली से,
आलसी, अकर्मठ, काहिल, हड़ताली से,
सी लें जबान, चुपचाप काम पर जायें,
हम यहाँ रक्त, वे घर में स्वेद बहायें।

हम दें उस को विजय, हमें तुम बल दो,
दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो।
हों खड़े लोग कटिबद्ध वहाँ यदि घर में,
है कौन हमें जीते जो यहाँ समर में ?

हो जहाँ कहीं भी अनय, उसे रोको रे !
जो करें पाप शशि-सूर्य, उन्हें टोको रे !

जा कहो, पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में,
या आग सुलगती रही प्रजा के मन में;
तामस बढ़ता यदि गया ढकेल प्रभा को,
निर्बन्ध पन्थ यदि मिला नहीं प्रतिभा को,

रिपु नहीं, यही अन्याय हमें मारेगा,
अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा। -रामधारी सिंह ‘दिनकर’

Tum Mujhme Ho

Posted: फ़रवरी 2, 2014 in Uncategorized

तुम मुझमें हो या मैं तुममें हूँ,
ये निर्णय आज नहीं होगा,
जाने ह्रदय अयान किस पल,
कब परिणय ताज नहीं होगा ॥

कलियों की भाषा मत सीखों,
तुम हठ करते हो शूल बनो,
जब काँटों ने प्रतिशोध लिया,
तब तुम कहते हो फूल बनो ॥

जैसे स्वप्न हँसा करते हैं मानो,
नित्य कृत्य के उपवन में,
चन्द्र-कला के विम्ब की भाँति,
निज अंतर-द्वंद्व के दर्पण में ॥

प्रीत किसे दुःख-हीन मिला हो,
किसे राम, किसे रहीम मिला हो,
परिचय-पत्र क्या उस मानव का,
ह्रदय जिसे स्वार्थ-हीन मिला हो ॥

जल-धारों में स्वार्थ जो होता,
वो रह सकती थी बंद घरो में,
गंगा,यमुना,अन्य देव नदियां,
बह सकती थी देव करो में ॥

बादल, सागर, पर्वत, अम्बर,
ये स्वार्थ-सुधा तज उन्मुक्त हैं,
कि तुम मुझमें हो या मैं तुममें हूँ,
ये प्रश्न कहाँ तक उपयुक्त हैं ॥

कब तुमने सोचा भाव-विधि से,
प्रिय, तुम मुझमें हो रिक्त-निधि से,
कभी संतृप्त नहीं ये मन होता हैं,
तुम चाहे सोचो दिव्य-विधि से ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Gantantra Divas Aur Aam Mat-Daata

Posted: जनवरी 26, 2014 in Uncategorized

गणतंत्र दिवस का महत्व धीरे-धीरे वार्षिक के साथ-साथ एक दिवसीय हो चूका हैं। बाकी के ३६४ दिन हमारे देश की गणतंत्रता आम आदमी के लिए कितनी सक्रिय हैं, इसके ऊपर अगर कोई सवाल खड़ा कर दे तो यह गलत नहीं होगा। हर चीज में आज कल राजनीतिकरण का खेल चल रहा हैं। सारे राजनीतिक दल मिल-बाँट कर इस गणतंत्र को पिछले ६४ वर्षों से बचाये रखने का श्रेय भी ले रहे हैं। आज तो राजनीति करनेवाले, एक आम आदमी को यह कह ही सकते है :
कि चाहे तुम किसी भी राह में चलो, यहाँ हर कारवां हमारा हैं ॥

अब बात जो भी हो इस गणतंत्र को एक आम आदमी ही चुनता हैं और हर पांच वर्ष के बाद ये अवसर उसे दिया जाता हैं। बात यह नहीं हैं कि एक आम मतदाता हर पाँच वर्षों में मिलनेवाली अपना एक दिवसीय मत आखिर किसे दे? कांग्रेस या बीजेपी या आप जैसी युवा पीढ़ी की एक कम अनुभवी और नवीन युगांतकारी दल या फिर कोई क्षेत्रीय दल ? बात यह हैं कि अगर वो मत उस दल को सीधे जाती हैं जिसे बहुमत नहीं भी हो पर सर्वाधिक स्थानों पर विजय मिलती हैं, तब दिल्ली में इस साल सांझे की संघ परिवार वाली सरकार नहीं आएगी फल-स्वरूप एक दलवाली सरकार का गठन सम्भव होगा और भविष्य में अगर कोई भी ऐसा राजकीय कार्य प्रकाश में आता हैं जिससे भ्रष्टाचार और दुर्नीति का बोध हो, तब आपके सामने एक दल प्रत्यक्ष मिलती हैं जिसे उत्तरदायित्व लेना पड़ता हैं और एक ही स्वर में हम सब सरकार पर आरोप लगा सकते हैं। जिससे कोई छिपने और छिपाने वाली बात नहीं रह जाती हैं और आनेवाले चुनाव में जनता अपनी फैसला दृढ़ता से ले पाती हैं। 

अब इसमें अगर किरण वेदी जी मोदी का समर्थन करती हैं , या फिर आदरणीय प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह जी कांग्रेस में रुके रहते हैं या फिर कप्तान गोपीनाथ सर जैसे बुद्धिजीव और मेधा पाटकर जैसी समाज-सेवी, केजरीवाल पर मुहर लगाने को कहते हैं तो कोई समस्या की बात नहीं हैं। जब तक अंत में उनका मत उस दल को जाता हैं जो सर्वाधिक स्थानों पे विजय हासिल करती हैं तब तक मुझे कोई गलत बात नहीं लगती। सरकार स्थायी हो और देश का काम तेजी से आगे बढे तो किसी को क्या समस्या हो सकती हैं, सिवाय इसके कि आपकी विचारधारा और सरकार की विचारधारा में मेल नहीं हो। मेरा मानना हैं कि देश का स्थान पहले और फिर आपकी विचारधारा आती हैं। इतिहास ने ऐसे कितने अवसर देखे हैं जहाँ वीरों ने अपनी विचारधारा से बढ़ कर ऐसा कार्य किया हैं जिससे देश का हित हो। अगर ऐसा नहीं होता तो आज चाणक्य और चन्द्रगुप्त की वो ऐतिहासिक कड़ी नहीं होती, न ही रामायण एक महाकाव्य बना होता जिसमे कैकेयी की वो भूमिका होती जिससे श्री राम चन्द्र को अयोध्या छोड़कर १४ वर्षों का वनवास लेना पड़ता, न ही वेदव्यास जी महाभारत जैसा महाकाव्य लिख पाये होते जिसमे गंगा पुत्र भीष्म के महा-प्रण लेने उपरांत धृतराष्ट्र ने अपने विचारधारा को महान मान हस्तिनापुर की राजगद्दी सम्भाली और न ही हमें गीता जैसा धर्म-ग्रन्थ मिला होता जिसमे भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को यही बात समझाने के लिए गीता का उवाच किया । 

मत देश के विकाश में अग्रसर हो और किसी की अपनी विचारधारा उस व्यक्ति विशेष के विकाश में अग्रसर हो, तो ज्यादा न्यायसंगत जान पड़ता हैं। बाकी आपकी पूरी बनती हैं कि यह निर्णय ले कि आप किसे मत देंगे। आप एक स्थायी और विकाश हेतु स्पष्ट और जल्द फैसले लेनेवाली सरकार चाहेंगे या फिर अपनी विचारधारा पर सवार हो एक बहु-दलीय सांझे वाली सरकार जिसे हम पिछले कई दशकों से झेलते आये हैं। जय हिन्द। 

-चन्द्र शेखर तिवारी

Ye Bayaaban Hain

Posted: जनवरी 26, 2014 in Uncategorized

ये बयाबां हैं, महफिलों के दम पे,
ज़िंदा हैं हम, शायरों के कलम पे ॥ 

ये बयाबां हैं, उसूलों के दम पे, 
ज़िंदा हैं हम, ज़िन्दगी तेरे ग़म पे॥

ये बयाबां हैं, मंज़िलों के दम पे, 
ज़िंदा हैं हम, कारवों के सितम पे॥

ये बयाबां हैं, असीरों के दम पे, 
ज़िंदा हैं हम, बशरियतों के वहम पे॥

ये बयाबां हैं, नसीबों के दम पे, 
ज़िंदा हैं हम, इनायतों के करम पे॥

ये बयाबां हैं, नज़ीरों के दम पे, 
ज़िंदा हैं हम, खैरियतों के रहम पे॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Kuchh Ameeron Ke Ghar Mein

Posted: जनवरी 26, 2014 in Uncategorized

कुछ अमीरों के घर में वो कागज़, कलम हैं, 
लिखे जिनकी किस्मत उन गरीबों में हम हैं ॥

ज़ुल्म-ओ-क़वाइद जिनका दैर-ओ-हरम हैं,
उन्हें सलाखों में डाले वो कानून अभी कम हैं ॥ 

कोई करे दुनिया भी शामिल हमें दिखनेवाले,
हमारी सपनों की दुनिया के दिये बुझनेवाले ॥

अब तक मिले कितने शायर हमें लिखनेवाले,
अमीरों की शोहरत में ये कलम बिकनेवाले ॥ 

कोई फसल काँट ले या फिर ज़मीं छीने अपनी,
मोड़े हवाओं का आँचल या आसमां का पानी ॥

इस सोने से मिट्टी की लगाओ कीमत कुछ भी,
खून बहा हैं उसमे हमारा, वही हैं हमारी कहानी ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी