Paaya To Kya Paaya

Posted: जुलाई 14, 2014 in Uncategorized

मैं सोच रहा, सिर पर अपार,
दिन, मास, वर्ष का धरे भार,
पल, प्रतिपल का अंबार लगा,
आखिर पाया तो क्या पाया?

जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा,
जब थाप पड़ी, पग डोल उठा,
औरों के स्वर में स्वर भर कर,
अब तक गाया तो क्या गाया?

सब लुटा विश्व को रंक हुआ,
रीता तब मेरा अंक हुआ,
दाता से फिर याचक बनकर,
कण-कण पाया तो क्या पाया?

जिस ओर उठी अंगुली जग की,
उस ओर मुड़ी गति भी पग की,
जग के अंचल से बंधा हुआ,
खिंचता आया तो क्या आया?

जो वर्तमान ने उगल दिया,
उसको भविष्य ने निगल लिया,
है ज्ञान, सत्य ही श्रेष्ठ किंतु,
जूठन खाया तो क्या खाया? – हरिशंकर परसाई

 
 

O Mere Aasmaan

Posted: जून 23, 2014 in Uncategorized

ओ मेरे आसमां, ओ मेरे आसमां ॥

अपने सूरज को थोड़ा कम कर दे,
अपनी आँखों को थोड़ा नम कर दे,
कब से प्यासी हैं तेरी धरती,
अपनी धरती पे कुछ रहम कर दे ॥

ओ मेरे आसमां, ओ मेरे आसमां ॥

सारे तारे उदास बैठे हैं,
चाँद के आस-पास बैठे हैं,
इतने रौशन हैं दिख नहीं सकते,
इसलिए बद-हवास बैठे हैं ॥

तू बता दे उजाला किसका हैं ?
नूर में ये हवाला किसका हैं ?
इसकी गिनती का कुछ करम कर दे,
अपनी धरती पे कुछ रहम कर दे ॥

ओ मेरे आसमां, ओ मेरे आसमां ॥ -डॉ कुमार विश्वास

Kah Liya Karo

Posted: मई 30, 2014 in Uncategorized

हर बेज़बाँ को शोला नवा कह लिया करो,
यारो सुकूत ही को सदा कह लिया करो ।

खुद को फरेब दो की न हो तल्ख़ ज़िंदगी,
हर संगदिल को जान-ए-वफ़ा कह लिया करो ।

गर चाहते हो खुश रहें कुछ बन्दगान-ए-ख़ास,
जितने सनम हैं उन को खुदा कह लिया करो ।

इंसान का अगर क़द-ओ-क़यामत न बढ़ सके,
तुम इस को नुक्स-ए-आब-ओ-हवा कह लिया करो ।

अपने लिए अब एक ही राह-ए-निजात हैं,
हर ज़ुल्म को रज़ा-ए-खुदा कह लिया करो ।

ले दे के अब यही है निशान-ए-जिया ‘क़ातील ‘,
जब दिल जले तो उस को दीया कह लिया करो । -क़ातील शिफ़ाई

He Ishwar

Posted: मई 27, 2014 in Uncategorized

कहाँ-कहाँ मैं ढूँढू तुझको,
कहाँ से देखू तेरा सितारा,
मैं जीता जब भी तू ही जीता,
जब कभी हारा मैं ही हारा ।

इस कुल रहूँ या उस कुल रहूँ,
मैं तो धरा का धूल रहूँ,
कौन सुनेगा व्यवच्छेद ये मेरा,
मैं तो अनन्तर भूल रहूँ ।

अधिकार नहीं मिलता विनय से,
जब नीति हो मूक अनीति के भय से,
क्यों द्वार हैं बंद तू पूछ ह्रदय से,
नहीं अर्थ तुझे क्या धर्म के क्षय से?

हे ईश्वर ! तू यदि हैं, इस नश्वर जग में,
तनिक दया भी शेष जो तेरे रग में,
तेरे नेत्र नहीं क्यों नीर बहाते ,
गुहार ये तुम तक क्यों नहीं जाते । -चन्द्र शेखर तिवारी

Bhikshuk

Posted: मई 26, 2014 in Uncategorized

भिक्षुक -सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

वह आता–
दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता।

पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को– भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता–
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाये।
भूख से सूख ओठ जब जाते
दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?–
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!

Punya Kamaanewale

Posted: मई 25, 2014 in Uncategorized

पुण्य कमानेवाले योगी, 
पाप के सर पर नाच रहे,
सदियों से पट खुला नहीं, 
मंदिर-मस्जिद बाँट रहे । 

जो लौ जलाये फिरते हैं, 
तंत्र-मंत्र की दीप लिए,
उनसे कह दो अब दूर रहे, 
मानवता हम सीख लिए । 

ये तर्क उन्हें ही दीखता हैं,
श्लोकों और तफ़्सीरों में,
जो न माने वो धर्म-द्रोही हैं,
फिर जकड़ेंगे ज़ंजीरों में । 

जो वेद-कुरान के मालिक हैं,
कहो उन्हें बनाया हैं किसने?
वो लड़े तो तुम्हें भी लड़ना हैं,
कहो धर्म बताया हैं किसने?

ऐसा कोई दिव्य-वरदान नहीं,
जो जटा बढ़ा कर तुम ले लो,
कर धारण कंठी-माला गर्दन में,
स्वर्ग की सीढ़ी तुम चढ़ लो ।

उस पत्थर का क्यों नाम रटे?
जिसे शीश झुकाना निमित हो,
जो सर्वज्ञ वधिर हो अज्ञ हुआ,
स्वयं जिसकी शक्ति सीमित हो । -चन्द्र शेखर तिवारी

Jaago Phir Ek Baar

Posted: अप्रैल 28, 2014 in Uncategorized

जागो फिर एक बार – सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

जागो फिर एक बार!
प्यार जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें
अरुण-पंख तरुण-किरण
खड़ी खोलती है द्वार-
जागो फिर एक बार!

आँखे अलियों-सी
किस मधु की गलियों में फँसी,
बन्द कर पाँखें
पी रही हैं मधु मौन
अथवा सोई कमल-कोरकों में?-
बन्द हो रहा गुंजार-
जागो फिर एक बार!

अस्ताचल चले रवि,
शशि-छवि विभावरी में
चित्रित हुई है देख
यामिनीगन्धा जगी,
एकटक चकोर-कोर दर्शन-प्रिय,
आशाओं भरी मौन भाषा बहु भावमयी
घेर रहा चन्द्र को चाव से
शिशिर-भार-व्याकुल कुल
खुले फूल झुके हुए,
आया कलियों में मधुर
मद-उर-यौवन उभार-
जागो फिर एक बार!

पिउ-रव पपीहे प्रिय बोल रहे,
सेज पर विरह-विदग्धा वधू
याद कर बीती बातें, रातें मन-मिलन की
मूँद रही पलकें चारु
नयन जल ढल गये,
लघुतर कर व्यथा-भार
जागो फिर एक बार!

सहृदय समीर जैसे
पोंछों प्रिय, नयन-नीर
शयन-शिथिल बाहें
भर स्वप्निल आवेश में,
आतुर उर वसन-मुक्त कर दो,
सब सुप्ति सुखोन्माद हो,
छूट-छूट अलस
फैल जाने दो पीठ पर
कल्पना से कोमल
ऋतु-कुटिल प्रसार-कामी केश-गुच्छ।
तन-मन थक जायें,
मृदु सरभि-सी समीर में
बुद्धि बुद्धि में हो लीन
मन में मन, जी जी में,
एक अनुभव बहता रहे
उभय आत्माओं मे,
कब से मैं रही पुकार
जागो फिर एक बार!

उगे अरुणाचल में रवि
आई भारती-रति कवि-कंठ में,
क्षण-क्षण में परिवर्तित
होते रहे प्रकृति-पट,
गया दिन, आई रात,
गयी रात, खुला दिन
ऐसे ही संसार के बीते दिन, पक्ष, मास,
वर्ष कितने ही हजार-
जागो फिर एक बार! -सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”