Ye Nazmon Mein Meri Wazah Dhundhte Hain

Posted: दिसम्बर 12, 2014 in Uncategorized

ये नज़्मों में मेरी वज़ह ढूँढ़ते हैं,
खुद के दिलों में जगह ढूँढ़ते हैं,
हया-दार होकर सबब ढूँढ़ते हैं,
बे-अदब खुद हैं अदब ढूँढ़ते हैं ॥

अपने ही शहर में शहर ढूँढ़ते हैं,
बेगानों के जैसे नज़र ढूँढ़ते हैं,
मुहब्बत में अपनी ज़हर ढूँढ़ते हैं,
इबादत नहीं पर असर ढूँढ़ते हैं ॥

ये पायाबियों में लहर ढूँढ़ते हैं,
राह-ओ-डगर में ठहर ढूँढ़ते हैं,
सहरा-ओ-सहरा बसर ढूँढ़ते हैं,
अपनों के दर पे बदर ढूँढ़ते हैं ॥

ये रक़ीबों के जैसे जिगर ढूँढ़ते हैं,
बेफिक्री में कैसी फिकर ढूँढ़ते हैं,
सितारों से ऊँचें शिखर ढूँढ़ते हैं,
मंज़िल मिले तो सिफर ढूँढ़ते हैं॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Aaj Ki Raat

Posted: नवम्बर 17, 2014 in Uncategorized

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,
आज की रात न फ़ुटपाथ पे नींद आएगी,
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो,
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी |

ये ज़मीन तब भी निगल लेने पे आमादा थी,
पाँव जब टूटी शाख़ों से उतारे हम ने,
इन मकानों को ख़बर है न मकीनों को ख़बर,
उन दिनों की जो गुफ़ाओं में गुज़ारे हम ने |

हाथ ढलते गये साँचे में तो थकते कैसे,
नक़्श के बाद नये नक़्श निखारे हम ने,
की ये दीवार बुलन्द, और बुलन्द, और बुलन्द,
बाम-ओ-दर और ज़रा, और सँवारे हम ने |

आँधियाँ तोड़ लिया करती थीं शमों की लौएं,
जड़ दिये इस लिये बिजली के सितारे हम ने,
बन गया क़स्र तो पहरे पे कोई बैठ गया,
सो रहे ख़ाक पे हम शोरिश-ए-तामीर लिये |

अपनी नस-नस में लिये मेहनत-ए-पैहम की थकन,
बंद आँखों में इसी क़स्र की तस्वीर लिये,
दिन पिघलता है इसी तरह सरों पर अब तक,
रात आँखों में ख़टकती है स्याह तीर लिये |

आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है,
आज की रात न फ़ुट-पाथ पे नींद आयेगी,
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो,
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी | -कैफ़ी आज़मी

Raasta To Chale

Posted: नवम्बर 17, 2014 in Uncategorized

खार-ओ-खस तो उठें, रास्ता तो चले,
मैं अगर थक गया, काफ़ला तो चले |

चांद, सूरज, बुजुर्गों के नक्श-ए-क़दम,
खैर बुझने दो उनको हवा तो चले |

हाकिम-ए-शहर, यह भी कोई शहर है,
मस्जिदें बंद हैं, मैकदा तो चले |

उसको मज़हब कहो या सिआसत कहो!
खुद्कुशी का हुनर तुम सिखा तो चले |

इतनी लाशें मैं कैसे उठा पाउँगा,
आप ईंटों की हुरमत बचा तो चले |

बेल्चे लाओ, खोलो ज़मीन की तहें,
मैं कहाँ दफ़न हूँ, कुछ पता तो चले | -कैफ़ी आज़मी

Uske Shahar Se

Posted: नवम्बर 3, 2014 in Uncategorized

उसके शहर से मिलता-जुलता, नाम-ओ-शहर ढूँढ लाये कोई,
हमको यकीन हैं वो फिर मिलेंगे, इश्क़-ओ-ज़हर ढूँढ लाये कोई ॥

तिनकों के घर से हिलता-डुलता, ख्वाबों के घर अब बनाये कोई,
दिल के सफर में हम फिर चलेंगे, राह-ओ-डगर तो बताये कोई ॥

खून-ए-जिगर में शरार सा जलता, आफत-ए-जान बन जाये कोई,
अगर मंज़ूर नहीं तक़सीम के फिकरे, एक और दफा आज़माएं कोई ॥

न ज़ौक़-ए-नज़र, न ख़याल से रफ्ता, कहो कैसे खुदा बन जाये कोई,
लहरों को हासिल साहिल नहीं पर, कोई कश्ती हो पार लगाये वो ही ॥

कितने शीश-महल में आते-जाते, कभी मिट्टी के घर भी जाये कोई,
इंसाफ नहीं, तक़दीर जो लिखते, किसे फ़रियाद अब सुनाये कोई ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Tum Se Tum Mein

Posted: सितम्बर 14, 2014 in Uncategorized

तुम से तुम में मिलने का,
प्रिये ! क्या तर्क रखा जाए,
जो मार्ग प्रवृत हैं लहरों का,
कहो कैसे अर्थ कहा जाए !!

अंतर-कण में, अंतर-तम में,
प्राप्य हमें, प्रिये ! हार हुआ,
प्रीत विवेक या प्रीत के भ्रम में,
जो प्रश्न उठे, धिक्कार हुआ !!

लक्ष्य-हीन हो पथ पर चलना,
हठ ये नहीं, एक प्रयोजनता हैं,
लक्ष्य हो, तो क्या सृजनता हैं ?,
स्वीकार नहीं तुम्हें, अनमनता हैं !!

अब अंत नहीं, जो शून्यता हैं,
इस जीवन में, जो न्यूनता हैं,
मिथ्या नहीं, ये दृष्टांत दिव्य हैं,
जीवन से ही जीवन बनता हैं !!

जब पुष्प बना, तो शूल रहा,
जब प्रणय बना, तो भूल रहा,
उस जीवन का सार ही क्या ?
जो अपूर्ण हुआ, तो पूर्ण रहा !!

-चन्द्र शेखर तिवारी

Kaanpura

Posted: अगस्त 31, 2014 in Uncategorized

कानपुरा (इंडियन ओसन):

उजड़ी रियासत लूटे सुल्तान,
अधमरी बुलबुल, आधी जान,
आधी सदी की आधी नदी में,
आधी सड़क पे पूरी शान !!

आधा-आधा जोड़ के बनता,
पूरा एक फितूरा,
और आधे बुझे चिराग के तल्ले,
पूरा कानपुरा !!

हटिया खुली, सराफा बंद,
ठाड़े रहो कलेक्टर-गंज,
बात-बात पे फैंटम बनना,
छोड़ो बैठ के मारो तंज !!

अरे अंगरेजन तो बिसर गए,
और गइया रोड पे पसर गयी,
अंडू-बकसई करते करते,
बची-खुची सब कसर गयी !!

कसर गयी और भसर मची हैं,
चाट के लाल धतूरा,
और आधे बुझे चिराग के तल्ले,
पूरा कानपुरा !!

जेब पे पैबंद, मिजाज़ सिकंदर,
ढेर मदारी, एक कलंदर,
हैं रुकी सी रेत घड़ी,
जादू की टूटी सी छड़ी !!

आगे देख के पीछे चलता,
शहर ये पूरा का पूरा,
और आधे बुझे चिराग के तल्ले,
पूरा कानपुरा,
भईया पूरा पटना पूरा,
अरे पूरा राँची पूरा भईया,
पूरा गोरखपुरा !!

-वरुण ग्रोवर

Ab Lehron Se Milne Jaanaa Hain

Posted: अगस्त 31, 2014 in Uncategorized

अब किनारों पर क्या पाना हैं,
अब लहरों से मिलने जाना हैं ।

स्पष्ट नहीं कुछ,
जहाँ जीवन हो तुच्छ,
हर नीति अवम,
जहाँ स्वार्थ ही हो उच्च,
कहाँ अंतर-मन का ठिकाना हैं,
अब लहरों से मिलने जाना हैं ।

अम्बर ऊँचा,
धरती निचा,
हर अंतर्मन में,
व्यतिक्रम खिंचा,
अब कर्मों का मूल्य चुकाना हैं,
अब लहरों से मिलने जाना हैं ।

अब मार्ग मिले,
या जल-जल ही रहे,
रेचन तन-मन,
चाहे लहरों में बहे,
जग के उद्गम का ये मुहाना हैं,
अब लहरों से मिलने जाना हैं ।

करे अर्चन,
भयभीत हो मन,
सृष्टि जिसकी,
उसे जीवन अर्पण,
इस नश्वर जग में किसे आना हैं,
अब लहरों से मिलने जाना हैं ।

अब किनारों पर क्या पाना हैं,
अब लहरों से मिलने जाना हैं । -चन्द्र शेखर तिवारी