डोर किरणों की कब तक खींचें,
अब ज़मीन भी रो गया,
साँझ हैं देखो गोधूली हैं,
सूरज भी पश्चिम में सो गया,
कभी रौशनी ही रौशनी थी,
बस चार पल में क्या हुआ,
अविरत जो दृश्य दिख रहा था,
कहाँ तम के छल में खो गया,
पर ऐ पथिक तू कोई दृश्य नहीं हैं,
जो खो जाए किसी अँधेरे में,
तू रश्मि-रंजित कोई पुष्प नहीं हैं,
जो खिलता हो किसी सवेरे में,
तेरी मौन मुद्रा कभी परिहास्य नहीं हैं,
संकट की अभिव्यक्ति तेरी प्यास नहीं हैं,
हौसला रख ये तम अशेष नहीं हैं,
कि अभी प्रारंभ हैं समर शेष नहीं हैं !! -ABZH
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