चार पल का हिसाब क्या रखे,
जब ज़िन्दगी का रखा ही नहीं,
रौशनी का रिवाज़ क्या रखे,
जब कभी दीपक जला ही नहीं !!
दर्द के बिना क्या हैं जीना,
अश्क नहीं तो फिर क्या हैं पीना,
खो कर सबकुछ हमे हैं जाना,
खोया नहीं तो फिर क्या हैं पाना !!
हम मंजिल का इंतज़ार क्या करे,
जब उन राहों पे चले ही नहीं,
तेरी महफ़िल में मेरे यार क्या करे,
जब तेरी आँखों में गिले ही नहीं !!
तू जो नहीं सौगात ही क्या हैं,
तेरी बात नहीं तो मेरी बात ही क्या हैं,
हाथ नहीं तो साथ ही क्या हैं,
तेरी जीत नहीं तो मेरी मात ही क्या है !!
-ABZH
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