Use Bhi

Posted: मार्च 10, 2017 in Uncategorized

उसे भी राशन की कतारों में खड़ा होना था,
उसे भी अम्मी की दुलारों में बड़ा होना था ।

उसकी हाथों में जुर्म के शरार थे किसके,
उसकी बातों में झूठ ये हजार थे किसके,
उसकी रातों से नींदें जो फरार थे किसके,
उसकी आँखों में सारे कारोबार थे किसके । 

उसे भी कॉलेज की किताबों में पड़ा होना था,
उसे भी अपनों की हिफाज़त में खड़ा होना था ।

हमारी राहें उस पर दुश्वार थी कबसे,
हमें करारी थी पर वो बेकरार था कबसे,
चाहता था अपने जैसा वो मिले सबसे,
किसी ने देखा उसे इंतज़ार था कबसे ।

उसे भी गुबार और पसीनें में बड़ा होना था,
उसे भी अब्बा की लकीरों पे खड़ा होना था । -चंद्र शेखर तिवारी

Phir Swar Se Swar Ka

Posted: फ़रवरी 5, 2017 in Uncategorized
फिर स्वर से स्वर का अनबन होगा,
वे अंतर-बल को तोड़ेंगे,
फिर कल्पित लक्ष्य से असंगत पथ में,
मिथ्या दंभ को जोड़ेंगे,
फिर सुख-दुःख के कई भाग बटेंगे,
कितने कृत्य को मोड़ेंगे,
फिर सुबह से लेकर साँझ तक हम-तुम,
निंद्य के वृत्त में दौड़ेंगे ।

फिर बादल के कण अदृष्ट गगन में,
निर्जल नीरस विचरेंगे,
फिर निष्ठुर पतझड़ झर-झर होगा,
और वन-वन पँछी भटकेंगे,
फिर तम से दग्ध चहुँ दिशा जलेगी,
तारे शुन्य से लिपटेंगे,
फिर कहीं नदी रुकेगी, सिंधु थमेगा,
वो कब तक अपना जल देंगे ।

फिर विद्वेष का कण-कण पीर बनेगा,
हम अंतर-अंतर दहकेंगें,
फिर कुछ सरल नहीं सब विकट ही होगा,
प्रतिशोध के पथ पर चल देंगे,
मैं इस पार रहूँ, कि मैं उस पार रहूँ,
ये निर्णय तुम पर छोड़ेंगे,
क्यों हम हारे नहीं, क्यों हम जीते नहीं,
इस द्विसंक्य का कैसे हल देंगे । -चंद्र शेखर तिवारी

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Antar Pal Ka

Posted: दिसम्बर 17, 2016 in Uncategorized

अंतर पल का, अंतर कल का,
अनिर्णीत तो इसमें क्या छल ?
तुम्हें बताना, तुम्हें सुनाना,
शिल्पनिर्मित हो शेष कहाँ बल ?

पग-पग, डग-डग, लक्ष्य बदल कर,
अपरिचित पथ में सुदूर तक चल कर,
पल-पल बोझिल, प्राण विकल कर,
तुम्हारी हर एक, बसंत नवल कर,

अंत-रहित तो इसमें क्या खल ?
पथ-भ्रमित तो इसका क्या हल ?

बंधन पल का, मंथन कल का,
अपरिमित तो इसमें क्या छल ?
तुम्हें हँसाना, तुम्हें रुलाना,
वंचन-कृत हो शेष कहाँ बल ?

प्रतिभूत तुम्हें कर, स्वयं से छल कर,
दायित्व-बोध के मूल्य में जल कर,
नीति-अनीति के द्वन्द को हल कर,
मैं साथ तुम्हारें, अन्त तक चल कर,

पृथक्कृत तो इसमें क्या खल ?
परिसीमित तो इसका क्या हल ? -चंद्र शेखर तिवारी

Need Ka Nirman

Posted: दिसम्बर 17, 2016 in Uncategorized
नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!
 
वह उठी आँधी कि नभ में
छा गया सहसा अँधेरा,
धूलि धूसर बादलों ने
भूमि को इस भाँति घेरा,
 
रात-सा दिन हो गया, फिर
रात आ‌ई और काली,
लग रहा था अब न होगा
इस निशा का फिर सवेरा,
 
रात के उत्पात-भय से
भीत जन-जन, भीत कण-कण
किंतु प्राची से उषा की
मोहिनी मुस्कान फिर-फिर!
 
नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!
 
वह चले झोंके कि काँपे
भीम कायावान भूधर,
जड़ समेत उखड़-पुखड़कर
गिर पड़े, टूटे विटप वर,
 
हाय, तिनकों से विनिर्मित
घोंसलो पर क्या न बीती,
डगमगा‌ए जबकि कंकड़,
ईंट, पत्थर के महल-घर;
 
बोल आशा के विहंगम,
किस जगह पर तू छिपा था,
जो गगन पर चढ़ उठाता
गर्व से निज तान फिर-फिर!
 
नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!
 
क्रुद्ध नभ के वज्र दंतों
में उषा है मुसकराती,
घोर गर्जनमय गगन के
कंठ में खग पंक्ति गाती;
 
एक चिड़िया चोंच में तिनका
लि‌ए जो जा रही है,
वह सहज में ही पवन
उंचास को नीचा दिखाती!
 
नाश के दुख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता से
सृष्टि का नव गान फिर-फिर!
 
नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर! -हरिवंशराय बच्चन

Wazood Badla Hain

Posted: अगस्त 30, 2016 in Uncategorized

वज़ूद बदला हैं,
पहचान बदला हैं,
कोई इंसान कहता हैं,
भगवान बदला हैं ।

तबाही अच्छी-खासी हैं,
अक़्सर नाम बदलती हैं,
अंजाम एक से हैं सब,
पर इंसान बदलती हैं ।

यकीन बदला हैं,
इन्साफ बदला हैं,
कोई इल्ज़ाम कहता हैं,
तमाम बदला हैं ।

ज़ुबानें उठती-गिरती हैं,
जो पहचान बदलती हैं,
इल्ज़ाम एक से हैं सब,
पर इंसान बदलती हैं ।

कारवाँ बदला हैं,
निशान बदला हैं,
कोई पासबान कहता हैं,
कहकशान बदला हैं ।

मुश्किलें आती-जाती हैं,
अक़्सर राह बदलती हैं,
मक़ाम एक से हैं सब,
पर इंसान बदलती हैं ।

सवाल बदला हैं,
जवाब बदला हैं,
कोई इम्तिहान कहता हैं,
फरमान बदला हैं ।

नफ़रतें बढ़ती-घटती हैं,
दैर-ओ-हरम बदलती हैं,
इंतजाम एक से हैं सब,
पर इंसान बदलती हैं ।

दस्तूर बदला हैं,
दास्तान बदला हैं,
कोई बागवान कहता हैं,
गुलिस्तान बदला हैं ।

नक़ाबें मिलती-जुलती हैं,
चेहरों के रंग बदलती हैं,
बेज़ुबान एक से हैं सब,
पर इंसान बदलती हैं । -चंद्र शेखर तिवारी

Ki Bad-Khwabi Hain

Posted: जुलाई 23, 2016 in Uncategorized
कि बद-ख्वाबी हैं, बेकसी हैं, या बेवजूद हैं हवाएँ,
क्यों इन दरख्तों के पत्तों से कोई दुआ नहीं आती,
तूफां उठे तो कितनी देर तक, कितनी दूर तक चले,
तिनकों और पत्थरों के शहर में इंतेहां नहीं जाती ।
 
जो टूट के गिरे बादल तो एक फरमान ये समझो,
कि जुर्म कोई हो इस धरती पर बेज़ुबां नहीं जाती,
कौन फिक्र करे हो गई बे-नंग-ओ-नाम की दुनिया,
ज़िन्दगी मौत की सरहद तक दो दफा नहीं जाती ।
 
हर शख्स यहाँ शामिल हैं आसमां की परस्तिश में,
हम मीलों दौड़ आयें पर क्यों राहें पता नहीं लाती,
गुमनाम कोई बस्ती हो या सितारों की टोली हो,
फासला रह गया कितना आखिर बता नहीं पाती ।
 
यूँ अँधेरे ने कैद कर रखा हैं इंसाफ की रिवायत को,
यहाँ ज़ुल्म साफ़ दीखता हैं फिर भी सदा नहीं आती,
कि अब चिराग सूरज का यूँ ही जाया होगा कब तक,
कोई भी तरकीब कर लूँ, इस रूह में सबा नहीं आती । -चन्द्र शेखर तिवारी

Kuch Na Kuch Hoga

Posted: जून 7, 2016 in Uncategorized

मेरी जानिब से ग़ैरों ने लगाया कुछ न कुछ होगा,
न आया वो तो उसके जी में आया कुछ न कुछ होगा ।

लड़े है मैकदे में आज जो यूं शीशा – ओ – सागर,
करिश्मा चश्मे-साक़ी ने दिखाया कुछ न कुछ होगा ।

न ढूंढ़ा और न पाया हमने कुछ इस बह् रे-हस्ती में,
वगरना जिसने ढूंढ़ा उसने पाया कुछ न कुछ होगा ।

सुना मैंने कटी उनकी भी सारी रात आँखों में,
किसी ने मेरा अफसाना सुनाया कुछ न कुछ होगा । -बहादुर शाह ‘ज़फ़र’