Bezubaan

Posted: अप्रैल 20, 2015 in Uncategorized

बेज़ुबां : अनुपम रॉय/मनोज यादव –

किस लम्हें ने थामी उंगली मेरी,
फुसला के मुझको ले चला,
नंगे पावों दौरी आँखें मेरी,
ख्वाबों की सारी बस्तियां ।

हर दूरियां, हर फासले करीब हैं,
इस उम्र की भी शख्सियत अजीब हैं ।

झीनी-झीनी, इन साँसों से,
पहचानी सी, आवाज़ों में,
गूंजें हैं आज आसमां,
कैसे हम बेज़ुबां !!

इस जीने में, कहीं हम भी थे,
थे ज्यादा या, ज़रा कम ही थे,
रुक के भी चल पड़े मगर,
रस्ते सब बेज़ुबां !!

जीने की यह कैसी आदत लगी,
बेमतलब कर्ज़े चढ़ गए,
हादसों से बचके जाते कहाँ,
सब रोते-हँसते सह गए ।

अब गलतियाँ जो मान ली तो ठीक हैं,
कमज़ोरियों को मात दी तो ठीक हैं ।

झीनी-झीनी, इन साँसों से,
पहचानी सी, आवाज़ों में,
गूंजें हैं आज आसमां,
कैसे हम बेज़ुबां !!

Haar Ho Kaise

Posted: अप्रैल 13, 2015 in Uncategorized

ऐ पथिक ! तू पथ को पार हो कैसे?
जो हिय नहीं माने, तो हार हो कैसे ?

पग-पग कंटक पथ में बिछे हो,
लक्ष्य-हीन हो पथिक चले हो।
जब चार पहर हो सूर्य ढले हो,
तम के भय से दम निकले हो।

डग-मग करते कदम अड़े हो,
पथ में संकट विकट खड़े हो।
घन के गर्जन से गगन डरे हो,
जब चहुँ दिशायें बंद पड़े हो ।

धैर्य-हीन हो मन भटके हो,
शब्द-हीन हो स्वर अटके हो ।
साँसों के कण-कण छटके हो,
ज्यों प्राणों से ये तन लटके हो ।

अनवरत बढ़ने की चाह हटे हो,
हर साथ छूटे, हर राह बटे हो ।
लत-पथ पग और गात कटे हो,
प्रति-पल जीवन-पात घटे हो ।

ऐ पथिक ! तू पथ को पार हो कैसे?
जो हिय नहीं माने, तो हार हो कैसे ?

-चन्द्र शेखर तिवारी

Aasha Ka Deepak

Posted: अप्रैल 12, 2015 in Uncategorized

आशा का दीपक :

यह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है,
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है|

चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से,
चमक रहे पीछे मुड़ देखो चरण-चिन्ह जगमग से|
शुरू हुई आराध्य भूमि यह क्लांत नहीं रे राही;
और नहीं तो पाँव लगे हैं क्यों पड़ने डगमग से|

बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है,
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है|

अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का,
सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश निर्मम का।
एक खेप है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ;
वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का।

आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा,
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही;
अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।

और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है,
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है। -रामधारी सिंह “दिनकर”

Jhuth-jhuth bol kar

Posted: फ़रवरी 8, 2015 in Uncategorized

झूठ-झूठ बोल कर, हो रही हैं हरकतें,
झूठ-झूठ बोल कर, बरकतें ही बरकतें ।

जुबां से बोलता नहीं, आँख बंद हैं पड़ी,
आसमां के वास्ते, ज़मीं पे मुश्किलें बढ़ी ।

वाह ! कैसी ज़िन्दगी, आदमी को चाहिए,
दाल-रोटी अब नहीं, हार-मोती चाहिए ।

हैं बड़ा वो आदमी, कितना आलिशान हैं,
जितना ऊँचा हैं खड़ा, उतना बेईमान हैं ।

अब नया उसूल हैं, सच कहा तो भूल हैं,
झूठ खुशबूदार हैं, मुंह से निकला फूल हैं । -चन्द्र शेखर तिवारी

Bas Ek Tanhai

Posted: जनवरी 18, 2015 in Uncategorized

बस एक तन्हाई हैं जिसकी कमी नहीं आती,
कोई भी रुस्वाई हो आँखों में नमी नहीं आती,
ज़माना कहता हैं, रानाई-ए-ख़याल रायगाँ हैं,
तुम्हें दोस्ती आती हैं, पर दुश्मनी नहीं आती ॥

मौत ही मौत दम-ब-दम, पर ज़िन्दगी ज़रूरी हैं,
पुर्ज़ा-पुर्ज़ा भी निकले तो कैफियत नहीं जाती,
खुदायी भी हैं तो मंदिर के दर-ओ-दीवार जैसी,
टूट कर वीरान भी हो तो हैसियत नहीं जाती ॥

सिवाय नफरत के इंतिशार यहाँ कुछ और नहीं,
खाकिस्तार हुए जल कर, पर आरज़ू नहीं जाती,
अजीब लोग हैं यहाँ के, अजीब हैं मज़हब इनकी,
कितने भी दफा ईमान मरे, पर आबरू नहीं जाती ॥

दौर पे दौर इंक़लाब के गुजरे, जाने क्या बाकी हैं,
उन जाबीरों तक आज भी शिकायत नहीं जाती,
कि कितने ज़िंदा रहने की हर-रोज दुवा माँगते हैं,
मौत बेदार हैं, फिर भी उसकी रिवायत नहीं जाती ॥ – चन्द्र शेखर तिवारी

Aah Dharti Kitna Deti Hain

Posted: जनवरी 12, 2015 in Uncategorized

आ: धरती कितना देती है (सुमित्रानंदन पंत) :

मैने छुटपन मे छिपकर पैसे बोये थे
सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे ,
रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी ,
और, फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूगा !
पर बन्जर धरती में एक न अंकुर फूटा ,
बन्ध्या मिट्टी ने एक भी पैसा उगला ।
सपने जाने कहां मिटे , कब धूल हो गये ।

मै हताश हो , बाट जोहता रहा दिनो तक ,
बाल कल्पना के अपलक पांवड़े बिछाकर ।
मै अबोध था, मैने गलत बीज बोये थे ,
ममता को रोपा था , तृष्णा को सींचा था ।

अर्धशती हहराती निकल गयी है तबसे ।
कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने
ग्रीष्म तपे , वर्षा झूलीं , शरदें मुसकाई
सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे ,खिले वन ।

औ’ जब फिर से गाढी ऊदी लालसा लिये
गहरे कजरारे बादल बरसे धरती पर
मैने कौतूहलवश आँगन के कोने की
गीली तह को यों ही उँगली से सहलाकर
बीज सेम के दबा दिए मिट्टी के नीचे ।
भू के अन्चल मे मणि माणिक बाँध दिए हों ।

मै फिर भूल गया था छोटी से घटना को
और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन ।
किन्तु एक दिन , जब मै सन्ध्या को आँगन मे
टहल रहा था- तब सह्सा मैने जो देखा ,
उससे हर्ष विमूढ़ हो उठा मै विस्मय से ।

देखा आँगन के कोने मे कई नवागत
छोटी छोटी छाता ताने खडे हुए है ।
छाता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की;
या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं ,प्यारी –
जो भी हो , वे हरे हरे उल्लास से भरे
पंख मारकर उडने को उत्सुक लगते थे
डिम्ब तोडकर निकले चिडियों के बच्चे से ।

निर्निमेष , क्षण भर मै उनको रहा देखता-
सहसा मुझे स्मरण हो आया कुछ दिन पहले ,
बीज सेम के रोपे थे मैने आँगन मे
और उन्ही से बौने पौधौं की यह पलटन
मेरी आँखो के सम्मुख अब खडी गर्व से ,
नन्हे नाटे पैर पटक , बढ़ती जाती है ।

तबसे उनको रहा देखता धीरे धीरे
अनगिनती पत्तो से लद भर गयी झाडियाँ
हरे भरे टँग गये कई मखमली चन्दोवे
बेलें फैल गई बल खा , आँगन मे लहरा
और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का
हरे हरे सौ झरने फूट ऊपर को
मै अवाक रह गया वंश कैसे बढता है

यह धरती कितना देती है । धरती माता
कितना देती है अपने प्यारे पुत्रो को
नहीं समझ पाया था मै उसके महत्व को
बचपन मे , छि: स्वार्थ लोभवश पैसे बोकर

रत्न प्रसविनि है वसुधा , अब समझ सका हूँ ।
इसमे सच्ची समता के दाने बोने है
इसमे जन की क्षमता के दाने बोने है
इसमे मानव ममता के दाने बोने है
जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसले
मानवता की – जीवन क्ष्रम से हँसे दिशाएं
हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे ।

Na Tumse Hoga

Posted: दिसम्बर 23, 2014 in Uncategorized

इस लहर में पुकार न तुमसे होगा,
ये तरी, उस पार न तुमसे होगा ॥

जब हिये रहे क्षणिक जग-मग में,
जब पुष्प के मोह जिए तुम जग में,
जब काँटें नहीं चुभे कभी पग में,
जब स्वार्थ लिए ओढ़ रग-रग में,
इस तिमिर में विकार न तुमसे होगा,
इस विपद, प्रतिकार न तुमसे होगा॥

जब धर्म हो ओछे सिमटे पत्थर में,
जब निष्ठुर भाव बहे अन्तर में,
जब अहम हो अधम उठे अम्बर में,
जब एकात्म नहीं रहे ईश्वर में,
कोई भव्य हुंकार न तुमसे होगा,
कोई दिव्य अवतार न तुमसे होगा॥

इस लहर में पुकार न तुमसे होगा,
ये तरी, उस पार न तुमसे होगा ॥

जहाँ न शौर्य रहे, न अनल बहे,
जहाँ न दुर्बल की पीड़ा सबल सहे,
जहाँ लोभ के वश में सकल रहे,
जहाँ अपनों के घर में दखल रहे,
वहाँ नीति स्वीकार न तुमसे होगा,
वहाँ जीत और हार न तुमसे होगा ॥

इस लहर में पुकार न तुमसे होगा,
ये तरी, उस पार न तुमसे होगा ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी