Wazood Badla Hain

Posted: अगस्त 30, 2016 in Uncategorized

वज़ूद बदला हैं,
पहचान बदला हैं,
कोई इंसान कहता हैं,
भगवान बदला हैं ।

तबाही अच्छी-खासी हैं,
अक़्सर नाम बदलती हैं,
अंजाम एक से हैं सब,
पर इंसान बदलती हैं ।

यकीन बदला हैं,
इन्साफ बदला हैं,
कोई इल्ज़ाम कहता हैं,
तमाम बदला हैं ।

ज़ुबानें उठती-गिरती हैं,
जो पहचान बदलती हैं,
इल्ज़ाम एक से हैं सब,
पर इंसान बदलती हैं ।

कारवाँ बदला हैं,
निशान बदला हैं,
कोई पासबान कहता हैं,
कहकशान बदला हैं ।

मुश्किलें आती-जाती हैं,
अक़्सर राह बदलती हैं,
मक़ाम एक से हैं सब,
पर इंसान बदलती हैं ।

सवाल बदला हैं,
जवाब बदला हैं,
कोई इम्तिहान कहता हैं,
फरमान बदला हैं ।

नफ़रतें बढ़ती-घटती हैं,
दैर-ओ-हरम बदलती हैं,
इंतजाम एक से हैं सब,
पर इंसान बदलती हैं ।

दस्तूर बदला हैं,
दास्तान बदला हैं,
कोई बागवान कहता हैं,
गुलिस्तान बदला हैं ।

नक़ाबें मिलती-जुलती हैं,
चेहरों के रंग बदलती हैं,
बेज़ुबान एक से हैं सब,
पर इंसान बदलती हैं । -चंद्र शेखर तिवारी

Ki Bad-Khwabi Hain

Posted: जुलाई 23, 2016 in Uncategorized
कि बद-ख्वाबी हैं, बेकसी हैं, या बेवजूद हैं हवाएँ,
क्यों इन दरख्तों के पत्तों से कोई दुआ नहीं आती,
तूफां उठे तो कितनी देर तक, कितनी दूर तक चले,
तिनकों और पत्थरों के शहर में इंतेहां नहीं जाती ।
 
जो टूट के गिरे बादल तो एक फरमान ये समझो,
कि जुर्म कोई हो इस धरती पर बेज़ुबां नहीं जाती,
कौन फिक्र करे हो गई बे-नंग-ओ-नाम की दुनिया,
ज़िन्दगी मौत की सरहद तक दो दफा नहीं जाती ।
 
हर शख्स यहाँ शामिल हैं आसमां की परस्तिश में,
हम मीलों दौड़ आयें पर क्यों राहें पता नहीं लाती,
गुमनाम कोई बस्ती हो या सितारों की टोली हो,
फासला रह गया कितना आखिर बता नहीं पाती ।
 
यूँ अँधेरे ने कैद कर रखा हैं इंसाफ की रिवायत को,
यहाँ ज़ुल्म साफ़ दीखता हैं फिर भी सदा नहीं आती,
कि अब चिराग सूरज का यूँ ही जाया होगा कब तक,
कोई भी तरकीब कर लूँ, इस रूह में सबा नहीं आती । -चन्द्र शेखर तिवारी

Kuch Na Kuch Hoga

Posted: जून 7, 2016 in Uncategorized

मेरी जानिब से ग़ैरों ने लगाया कुछ न कुछ होगा,
न आया वो तो उसके जी में आया कुछ न कुछ होगा ।

लड़े है मैकदे में आज जो यूं शीशा – ओ – सागर,
करिश्मा चश्मे-साक़ी ने दिखाया कुछ न कुछ होगा ।

न ढूंढ़ा और न पाया हमने कुछ इस बह् रे-हस्ती में,
वगरना जिसने ढूंढ़ा उसने पाया कुछ न कुछ होगा ।

सुना मैंने कटी उनकी भी सारी रात आँखों में,
किसी ने मेरा अफसाना सुनाया कुछ न कुछ होगा । -बहादुर शाह ‘ज़फ़र’

Uske Ghar Tum

Posted: मई 17, 2016 in Uncategorized
उसके घर तुम कभी नहीं जाना, वो ईमान पूजता हैं,
वो न अल्लाह, वो न ईसा को, वो न राम पूजता हैं ।
 
वो बेनसीब, वो हैं हारा-भटका, वो आराम ढूँढ़ता हैं,
हम सब जाने अपने रस्ते-मंजिल, वो नाकाम ढूँढ़ता हैं ।
 
मिट्टी ही उसको चाँदी-सोना, वो न दाम देखता हैं,
हम ज़रदारी, हम व्यापारी, वो तमाम बेचता हैं ।
 
मात मिले या जीत हो हासिल, वो मक़ाम सोचता हैं,
सबकी चाहत उम्मीद से ज्यादा, वो अंजाम सोचता हैं ।
 
उसका कहीं नहीं आना-जाना, वो सलाम भेजता हैं,
कोई हो मालिक सारे जहां का, वो एहतेराम भेजता हैं । -चन्द्र शेखर तिवारी

Nahi Haar

Posted: अप्रैल 12, 2016 in Uncategorized

नहीं हार, नहीं हार, तू जीवन-रण ना हार,
सूरज लाख तपे भूमि से, नहीं सके हैं जार,
नहीं हार, नहीं हार, तू देख नदी जलधार,
पर्वत लाख काटे सरि-पथ, रोक सके ना धार।

नहीं हार, नहीं हार, तू जीवन-पथ ना डार,
सागर बढ़े कोटि-कोटि डग, फिर भी मिले किनार,
नहीं हार, नहीं हार, तू धीरज कभी ना टार,
मौन रह कई माह पात बिन, पतझड़ बने बहार।

नहीं हार, नहीं हार, तू लक्ष्य कभी ना हार,
प्रति-पल प्रति-क्षण पथ में तत्पर, धरती लिए हैं भार,
नहीं हार, नहीं हार, तू तोड़ दे भय के द्वार,
नभचर जाने अनंत हैं अम्बर, फिर भी करे हैं पार।

नहीं हार, नहीं हार, तू हर ले उर के अंधार,
विटप न जाने ऊँच-नीच क्या, सब को बाँटे आहार,
नहीं हार, नहीं हार, कर्म हो धर्म का सार,
बादल, पवन, धरती और अम्बर, सबका एक आधार। -चन्द्र शेखर तिवारी

Hum Le Ke Apna

Posted: मार्च 12, 2016 in Uncategorized

हम ले के अपना माल जो मेले में आ गए,
सारे दुकानदार दुकानें बढ़ा गए |

बस्ती के क़त्ले आम पे निकली न आह भी,
ख़ुद को लगी जो चोट तो दरिया बहा गए |

दुनिया की शोहरतें हैं उन्हीं के नसीब में,
अंदाज़ जिनको बात बनाने के आ गए |

फ़नकार तो ज़माने मे गुमनाम ही रहे,
ताजिर थे जो हुनर के ज़माने पे छा गए |

दोनों ही एक जैसे हैं कुटिया हो या महल,
दीवारो दर के मानी समझ में जो आ गए |

नज़रें हटा ली अपनी तो ये मोजजा हुआ,
जल्वे सिमट के ख़ुद मेरी आँखों मे आ गए |

पंडित उलझ के रह गए पोथी के जाल में,
क्या चीज़ है ये ज़िंदगी बच्चे बता गए |

~ हस्तीमल ‘हस्ती’

Maqsad Kuchh Aur Nahi

Posted: फ़रवरी 28, 2016 in Uncategorized

मक़सद कुछ और नहीं बस एक तमाशा खड़ा करना हैं,
हम आज़ाद हैं इस आज़ादी का बियाबां बयां करना हैं ।

करोड़ों के घर रोज़ फाके चले मगर हमें कहाँ लड़ना हैं,
बेवज़ह कहीं जंग-ओ-जदल की फ़र्ज़ पर अड़ा रहना हैं ।

जहाँ मंदिर बने, वहीँ मस्जिद बने, किसे आगे यहाँ बढ़ना हैं,
न भगवान मिले, न अल्लाह मिले, लड़-लड़ कर हमें मरना हैं ।

कई हुजूर हैं हमारे उक़्दो के, अपनी बातों पर कहाँ चलना हैं,
दुसरो की जुबां, दुसरो की दखल, ऐसी आज़ादी में हमें पलना हैं । -चन्द्र शेखर तिवारी