Charaag Jalkar dhuaan

Posted: जून 28, 2015 in Uncategorized
चराग जलकर धुआँ खुद ही बना होगा,
जो आरज़ू थी दिल की तो जला होगा ॥
 
मोड़ पे मोड़ छूटे होंगे जब चला होगा,
जाने फिर कितने दफा बुझ के ये जला होगा ॥
 
न जाने राहों में ये कितनों से मिला होगा,
पिन्हां नहीं यहाँ कुछ तन्हा ही चला होगा ॥
 
हवा के खौफ में भी दिन-रात चला होगा,
आब-ओ-हवा हो कुछ भी बेबाक जला होगा ॥
 
जला हो या बुझा हो किसे क्या गिला होगा,
तिनके से बना था तो तिनका ही जला होगा ॥
 
फलाकत कहे ज़माना या फक्र करे इस पर,
मुस्तक़बिल ने जो लिखा था कहाँ टला होगा ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Ant

Posted: जून 27, 2015 in Uncategorized

अन्त की भी क्या परिभाषा हैं,
अन्त ही अन्त की आशा हैं ॥

तुम उससे भागो या उसके टुकड़े करो,
तुम मानो अपना शत्रु या अंतर में भरो,
अन्त नहीं कहता कि मैत्री नहीं तुमसे,
कि अन्त अनीत हैं और तुम उससे लड़ो ॥

अन्त की भी क्या अभिलाषा हैं,
अन्त ही अन्त की भाषा हैं ॥

अन्त विध्वंश नहीं, अन्त सृजन श्रोत हैं,
अन्त मृत्यु नहीं, अन्त जीवन ज्योत हैं,
अन्त इस नश्वर जग का अमर सोच हैं,
अन्त दिव्य निनाद हैं, अन्त पावन मोक्ष हैं ॥
अन्त की भी क्या प्रत्याशा हैं,
अन्त ही अन्त की आशा हैं ॥

अन्त स्वयं नहीं आता, उसे बुलाते हो तुम,
अन्त अनभिज्ञ, उसे मार्ग दिखाते हो तुम,
अच्छे-बुरे कर्मों का लेख लिखाते हो तुम,
क्यों खेद तुम्हें? अन्त को अन्त बनाते हो तुम ॥

अन्त की भी क्या जिज्ञाषा हैं,
अन्त ही अन्त की भाषा हैं ॥

अन्त निरंतर, अन्त शाश्वत, अन्त विधान हैं,
अन्त अजेय, अन्त सर्वज्ञ, अन्त-हीन ज्ञान हैं,
भेद नहीं किसी के अन्त में, अन्त विज्ञानं हैं,
सत्य वचन हैं, हर मानव का अन्त महान हैं ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Phir Vikal Hain Pran Mere

Posted: जून 6, 2015 in Uncategorized

**—- छप्पन : यामा (महादेवी वर्मा) —-**

फिर विकल हैं प्राण मेरे !
तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूँ उस ओर क्या हैं !
जा रहे जिस पंथ से युग कल्प उसका छोर क्या हैं ?
क्यों मुझे प्राचीर बन कर आज मेरे श्वास घेरे ?

सिन्धु की निःसीमता पर लघु लहर का लास कैसा !
दीप लघु शिर पर धरे आलोक का आकाश कैसा !
दे रही मेरी चिरन्तनता क्षणों के साथ फेरे !

बिम्बग्राहकता कणों को शलभ को चिर साधना दी,
पुलक से नभ भर धरा को कल्पनामय वेदना दी;
मत कहो हे विश्व ! ‘झूठे हैं अतुल वरदान तेरे’ !

नभ डुबा पाया न अपनी बाढ़ में भी क्षुद्र तारे,
ढूँढने करुणा मृदुल घन चीर कर तूफ़ान हारे;
अन्त के तम में बुझे क्यों आदि के अरमान मेरे !

-महादेवी वर्मा

Ek Ho Prashn To Main Kah Deta

Posted: मई 17, 2015 in Uncategorized

एक हो प्रश्न तो मैं कह देता,
त्रास नहीं, मैं सब लिख देता ॥

तमस-पूर्ण नभ हैं तारापथ,
पार्थ ! अब सूना हैं तेरा रथ,
शिखा में तिरोहित शेष लिए,
जो वीर कटे, भटके हैं किस पथ ॥

जब अनीत बहा तो कुरुक्षेत्र बना,
भातृ-भुजा उठे, दम्भ नेत्र तना,
क्या गुरु? क्या तात? क्या पितामह?
स्वयं भगवान लड़े, कौन करे मना?

ऐतिह्य हो तुम, हूँ कृतज्ञ तुम्हारा,
तुमने कितने नर मृत-घाट उतारा,
क्या पुरे धरा पर और भूमि नहीं था?
क्या एक नारी के लिए ये युद्ध सही था?

एक न्याय किये एक न्याय मिटाकर,
तुम अहं में थे भगवान को पाकर,
क्या क्षमा, दया, तप, त्याग यही था?
क्या न्याय-धर्म का भाग्य यही था?

एक हो प्रश्न तो मैं कह देता,
त्रास नहीं, मैं सब लिख देता ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Kyonki Sapna Hain Abhi Bhi

Posted: मई 4, 2015 in Uncategorized

…क्योंकि सपना है अभी भी –
इसलिए तलवार टूटी अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध धूमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
…क्योंकि सपना है अभी भी !

तोड़ कर अपने चतुर्दिक का छलावा
जब कि घर छोड़ा, गली छोड़ी, नगर छोड़ा
कुछ नहीं था पास बस इसके अलावा
विदा बेला, यही सपना भाल पर तुमने तिलक की तरह आँका था
(एक युग के बाद अब तुमको कहां याद होगा?)
किन्तु मुझको तो इसी के लिए जीना और लड़ना
है धधकती आग में तपना अभी भी
….क्योंकि सपना है अभी भी !

तुम नहीं हो, मैं अकेला हूँ मगर
वह तुम्ही हो जो
टूटती तलवार की झंकार में
या भीड़ की जयकार में
या मौत के सुनसान हाहाकार में
फिर गूंज जाती हो

और मुझको
ढाल छूटे, कवच टूटे हुए मुझको
फिर तड़प कर याद आता है कि
सब कुछ खो गया है – दिशाएं, पहचान, कुंडल,कवच
लेकिन शेष हूँ मैं, युद्धरत् मैं, तुम्हारा मैं
तुम्हारा अपना अभी भी

इसलिए, तलवार टूटी, अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धूंध धुमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
… क्योंकि सपना है अभी भी !

-धर्मवीर भारती

Kuchh Baatein

Posted: मई 3, 2015 in Uncategorized

कुछ बातें रुकेंगी, कुछ साथ चलेंगी,
कुछ राहगुज़र, कुछ राह भूलेंगी।

कुछ बातें हँसेंगी, कुछ आँख मलेंगी,
कुछ ज़ौक़-ए-नज़र, कुछ राख बनेंगी।

कुछ बातें सहेंगी, कुछ शोर करेंगी,
कुछ बेबस होंगी, कुछ जोर करेंगी।

कुछ बातें बनेंगी, तो कुछ बिगड़ेंगी,
कुछ मंज़िल पर, तो कुछ भटकेंगी।

कुछ बातें बढ़ेंगी, कुछ बातें दबेंगी,
कुछ देर करेंगी, तो कुछ पहुंचेंगी।

कुछ बातें जलेंगी, कुछ बातें बुझेंगी,
कुछ चाक-ए-जिगर, कुछ शाद रहेंगी।

कुछ झूठे किस्से, कुछ साच कहेंगी,
कुछ मीलों हमसे, कुछ पास रहेंगी।

कुछ बातें भी होंगी, तो सांसें चलेंगी,
कुछ बातें भी होंगी, तो सांसें रुकेंगी। -चन्द्र शेखर तिवारी

Tumhein Sitaron Ki Khanak

Posted: अप्रैल 27, 2015 in Uncategorized

कि तुम्हें सितारों की खनक सुनाई देती हैं,
हमें चाँद तक दिखाई नहीं देता,
हमने सूरज के उजाले में देखी हैं,
आसमां में एक दाग दिखाई नहीं देता ॥

कि कितने इशारे करोगे और समझाओगे,
हमें कोई इल्ज़ाम दिखाई नहीं देता,
एक बात साफ़ लगती हैं तुम्हें बताता हूँ,
तुममें से कोई इंसान दिखाई नहीं देता ॥

कि पहुँचते ही होंगे फलक तक ये रास्ते तुम्हारे,
हमें कोई इत्मीनान दिखाई नहीं देता,
इंसानियत का ये सारा बियाबां हमें क़बूल हैं,
कहीं कोई बागबान दिखाई नहीं देता।

कि आशियाँ बनाने में कुछ वक़्त लगता हैं,
किसी की मजबूरियों पे कोई इत्तफ़ाक़ नहीं देता,
एक वक़्त के आने में भी कुछ वक़्त लगता हैं,
ऐतबार न हो तो खुदा भी इन्साफ नहीं देता॥ -चन्द्र शेखर तिवारी