Ek Ho Prashn To Main Kah Deta

Posted: मई 17, 2015 in Uncategorized

एक हो प्रश्न तो मैं कह देता,
त्रास नहीं, मैं सब लिख देता ॥

तमस-पूर्ण नभ हैं तारापथ,
पार्थ ! अब सूना हैं तेरा रथ,
शिखा में तिरोहित शेष लिए,
जो वीर कटे, भटके हैं किस पथ ॥

जब अनीत बहा तो कुरुक्षेत्र बना,
भातृ-भुजा उठे, दम्भ नेत्र तना,
क्या गुरु? क्या तात? क्या पितामह?
स्वयं भगवान लड़े, कौन करे मना?

ऐतिह्य हो तुम, हूँ कृतज्ञ तुम्हारा,
तुमने कितने नर मृत-घाट उतारा,
क्या पुरे धरा पर और भूमि नहीं था?
क्या एक नारी के लिए ये युद्ध सही था?

एक न्याय किये एक न्याय मिटाकर,
तुम अहं में थे भगवान को पाकर,
क्या क्षमा, दया, तप, त्याग यही था?
क्या न्याय-धर्म का भाग्य यही था?

एक हो प्रश्न तो मैं कह देता,
त्रास नहीं, मैं सब लिख देता ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Kyonki Sapna Hain Abhi Bhi

Posted: मई 4, 2015 in Uncategorized

…क्योंकि सपना है अभी भी –
इसलिए तलवार टूटी अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध धूमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
…क्योंकि सपना है अभी भी !

तोड़ कर अपने चतुर्दिक का छलावा
जब कि घर छोड़ा, गली छोड़ी, नगर छोड़ा
कुछ नहीं था पास बस इसके अलावा
विदा बेला, यही सपना भाल पर तुमने तिलक की तरह आँका था
(एक युग के बाद अब तुमको कहां याद होगा?)
किन्तु मुझको तो इसी के लिए जीना और लड़ना
है धधकती आग में तपना अभी भी
….क्योंकि सपना है अभी भी !

तुम नहीं हो, मैं अकेला हूँ मगर
वह तुम्ही हो जो
टूटती तलवार की झंकार में
या भीड़ की जयकार में
या मौत के सुनसान हाहाकार में
फिर गूंज जाती हो

और मुझको
ढाल छूटे, कवच टूटे हुए मुझको
फिर तड़प कर याद आता है कि
सब कुछ खो गया है – दिशाएं, पहचान, कुंडल,कवच
लेकिन शेष हूँ मैं, युद्धरत् मैं, तुम्हारा मैं
तुम्हारा अपना अभी भी

इसलिए, तलवार टूटी, अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धूंध धुमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
… क्योंकि सपना है अभी भी !

-धर्मवीर भारती

Kuchh Baatein

Posted: मई 3, 2015 in Uncategorized

कुछ बातें रुकेंगी, कुछ साथ चलेंगी,
कुछ राहगुज़र, कुछ राह भूलेंगी।

कुछ बातें हँसेंगी, कुछ आँख मलेंगी,
कुछ ज़ौक़-ए-नज़र, कुछ राख बनेंगी।

कुछ बातें सहेंगी, कुछ शोर करेंगी,
कुछ बेबस होंगी, कुछ जोर करेंगी।

कुछ बातें बनेंगी, तो कुछ बिगड़ेंगी,
कुछ मंज़िल पर, तो कुछ भटकेंगी।

कुछ बातें बढ़ेंगी, कुछ बातें दबेंगी,
कुछ देर करेंगी, तो कुछ पहुंचेंगी।

कुछ बातें जलेंगी, कुछ बातें बुझेंगी,
कुछ चाक-ए-जिगर, कुछ शाद रहेंगी।

कुछ झूठे किस्से, कुछ साच कहेंगी,
कुछ मीलों हमसे, कुछ पास रहेंगी।

कुछ बातें भी होंगी, तो सांसें चलेंगी,
कुछ बातें भी होंगी, तो सांसें रुकेंगी। -चन्द्र शेखर तिवारी

Tumhein Sitaron Ki Khanak

Posted: अप्रैल 27, 2015 in Uncategorized

कि तुम्हें सितारों की खनक सुनाई देती हैं,
हमें चाँद तक दिखाई नहीं देता,
हमने सूरज के उजाले में देखी हैं,
आसमां में एक दाग दिखाई नहीं देता ॥

कि कितने इशारे करोगे और समझाओगे,
हमें कोई इल्ज़ाम दिखाई नहीं देता,
एक बात साफ़ लगती हैं तुम्हें बताता हूँ,
तुममें से कोई इंसान दिखाई नहीं देता ॥

कि पहुँचते ही होंगे फलक तक ये रास्ते तुम्हारे,
हमें कोई इत्मीनान दिखाई नहीं देता,
इंसानियत का ये सारा बियाबां हमें क़बूल हैं,
कहीं कोई बागबान दिखाई नहीं देता।

कि आशियाँ बनाने में कुछ वक़्त लगता हैं,
किसी की मजबूरियों पे कोई इत्तफ़ाक़ नहीं देता,
एक वक़्त के आने में भी कुछ वक़्त लगता हैं,
ऐतबार न हो तो खुदा भी इन्साफ नहीं देता॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Badalna Hoga

Posted: अप्रैल 27, 2015 in Uncategorized

आसमान छोड़कर अब ज़मीन पे चलना होगा,
शहंशाह-ए-आलम ! सल्तनत ये बदलना होगा ॥

तस्लीम जाने अपना कि जुल्म को जलना होगा,
कानून का महकमा अब बाजार में चलना होगा ॥

मजरूह वक़्त के सीने से खंजर निकलना होगा,
झाँकें गिरेबान में किसके अब खुद को बदलना होगा ॥

हर क़बूलियत से दिल में ईमान को पलना होगा,
अब इंसानियत के रस्ते इंसान को चलना होगा ॥

दहशत और परक्खश को सरेआम मसलना होगा,
मुहब्बत के सहारे अब आपस में सम्भलना होगा ॥

राम और अल्लाह के जाल से निकलना होगा,
सबसे पहले मुँह से हिंदुस्तान निकलना होगा ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Main Is Ummeed Pe Dooba

Posted: अप्रैल 27, 2015 in Uncategorized

मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा,
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा ॥

यह एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा,
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा ॥

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा,
कोई चिराग नहीं हूँ जो फिर जला लेगा ॥

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए,
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा ॥

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे,
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा ॥

हज़ार तोड़ के आ जाऊं उस से रिश्ता “वसीम”,
मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा ॥ – वसीम बरेलवी

Bezubaan

Posted: अप्रैल 20, 2015 in Uncategorized

बेज़ुबां : अनुपम रॉय/मनोज यादव –

किस लम्हें ने थामी उंगली मेरी,
फुसला के मुझको ले चला,
नंगे पावों दौरी आँखें मेरी,
ख्वाबों की सारी बस्तियां ।

हर दूरियां, हर फासले करीब हैं,
इस उम्र की भी शख्सियत अजीब हैं ।

झीनी-झीनी, इन साँसों से,
पहचानी सी, आवाज़ों में,
गूंजें हैं आज आसमां,
कैसे हम बेज़ुबां !!

इस जीने में, कहीं हम भी थे,
थे ज्यादा या, ज़रा कम ही थे,
रुक के भी चल पड़े मगर,
रस्ते सब बेज़ुबां !!

जीने की यह कैसी आदत लगी,
बेमतलब कर्ज़े चढ़ गए,
हादसों से बचके जाते कहाँ,
सब रोते-हँसते सह गए ।

अब गलतियाँ जो मान ली तो ठीक हैं,
कमज़ोरियों को मात दी तो ठीक हैं ।

झीनी-झीनी, इन साँसों से,
पहचानी सी, आवाज़ों में,
गूंजें हैं आज आसमां,
कैसे हम बेज़ुबां !!