Zindagi Ki Doud Dekhein

Posted: फ़रवरी 7, 2016 in Uncategorized
अब आईये कुछ और देखें,
ज़िन्दगी की दौड़ देखें,
चाहे दुनिया जिस मुताबिक,
आदमी का गौर देखें ॥
 
हर रास्तों के बाद रस्तें,
रास्तों का छोर देखें,
क्या जाने-परखें दायरों को,
बेनाम ही हो मोड़ देखें ॥
 
गलतियों का वज़ूद वाजिब,
खामियों की ओर देखें,
जो सच दबे झूठ की खातिर,
हामियों की ओर देखें ॥
 
हौसलों के साथ रहकर,
मुश्किलों का शोर देखें,
अब साहिलों से दूर जाकर,
आँधियों का ज़ोर देखें ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Ab In Houslon Ke Shakh

Posted: नवम्बर 15, 2015 in Uncategorized
अब इन हौसलों के शाख काट कर फेंक दो,
नये शाख निकलेंगे तो शायद कोई सबक होगा,
बरसों से दिये और मोम जलकर राख हुए हैं,
ये सोचकर कि हवाओं में सुकून का महक होगा ।

कि दीवारों और चट्टानों से बचाव मुमकिन नहीं,
जब वक़्त के गुनाहों का ये दरिया समन्दर होगा,
अपने नक़ाब निकाल फेंको कि वो दिन दूर नहीं,
जब जुल्म के तूफानों का राह-बार सिकन्दर होगा ।

वो जो भड़कते हैं सिर्फ अपनों का खून देखकर,
वो बताये तो आखिर मुर्दों का क्या वतन होगा,
मौत किसी की हो, जुल्म की वही निशानी हैं,
इस तरह आपस में बँटवारे से क्या अमन होगा ।

अब आवाज़ ही सही, पर कुछ तो एक सा मिले,
कि मिन्नतों और दुवाओं का कोई तो असर होगा,
अब चींख किसी की हो, सबका दिल एक सा हिले,
किसी मासूम के अरमानों का कँही तो बसर होगा ।  -चन्द्र शेखर तिवारी

Phir Koi Ummeed Bane

Posted: नवम्बर 8, 2015 in Uncategorized

फिर कोई उम्मीद बने, हौसला दराज़ मुमकिन हो,
ख़ल्क़ से दौर चले, रात के आखिर फिर दिन हो।

फिर एक तारीख बने, रंज-ओ-तक़सीम मुश्किल हो,
कारवां फिर से चले, हर एक मोड़ अब मंज़िल हो।

हर तरफ ईमान रहे, फिर चैन-ओ-अमन शामिल हो,
मात पर भी फक्र रहे, अब जीत कुछ यूँ हासिल हो।

दुवाओं में जोर रहे, पर दैर-ओ-हरम न हाकिम हो,
गीता संग कुरान रहे ,सब इंसानियत के खादिम हो। -चन्द्र शेखर तिवारी

Shola Hoon

Posted: अक्टूबर 12, 2015 in Uncategorized

शोला हूँ भड़कने की गुजारिश नहीं करता,
सच मुँह से निकल जाता हैं कोशिश नहीं करता ।

गिरती हुई दीवार का हम-दर्द हूँ लेकिन,
चढ़ते हुए सूरज की परस्तिश नहीं करता ।

माथे के पसीने की महक आये न जिस से,
वो खून मेरे जिस्म में गर्दिश नहीं करता ।

हमदर्दी-ए-एहबाब से डरता हूँ ‘मुजफ्फर’,
मैं ज़ख्म तो रखता हूँ नुमाइश नहीं करता ।

-मुजफ्फर वारसी

Suna Hain

Posted: जुलाई 22, 2015 in Uncategorized

सुना हैं कि ज़ंजीरें चलती हैं !
हाँ ! किसी मासूम के गले से जेल के उस घर तक,
जहाँ क़ानून के अँधेरे में उसकी बेगुनाही की वजह ढूँढती हैं ।

सुना हैं कि लकीरें जलती हैं !
हाँ ! किसी बदकिस्मत इंसान की दायीं हथेली पर,
क़र्ज़ में डूबे किसी किसान की खेतों में उसकी राख मिलती हैं ।

सुना हैं कि ज़मीरें मरती हैं !
हाँ ! किसी पत्थर दिल में उसकी दीवारों से दबकर,
इंसाफ की झूठी पहचान बनकर तक़सीरी के तख़्त पर बिकती हैं ।

सुना हैं कि सरीरें डरती हैं !
हाँ ! वज़ीरों के महलों से आते सोने-चाँदी के खनक से,
तारीखों में दफ़न होती फरियादों की खामोशियाँ बयां करती हैं । -चन्द्र शेखर तिवारी

Charaag Jalkar dhuaan

Posted: जून 28, 2015 in Uncategorized
चराग जलकर धुआँ खुद ही बना होगा,
जो आरज़ू थी दिल की तो जला होगा ॥
 
मोड़ पे मोड़ छूटे होंगे जब चला होगा,
जाने फिर कितने दफा बुझ के ये जला होगा ॥
 
न जाने राहों में ये कितनों से मिला होगा,
पिन्हां नहीं यहाँ कुछ तन्हा ही चला होगा ॥
 
हवा के खौफ में भी दिन-रात चला होगा,
आब-ओ-हवा हो कुछ भी बेबाक जला होगा ॥
 
जला हो या बुझा हो किसे क्या गिला होगा,
तिनके से बना था तो तिनका ही जला होगा ॥
 
फलाकत कहे ज़माना या फक्र करे इस पर,
मुस्तक़बिल ने जो लिखा था कहाँ टला होगा ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Ant

Posted: जून 27, 2015 in Uncategorized

अन्त की भी क्या परिभाषा हैं,
अन्त ही अन्त की आशा हैं ॥

तुम उससे भागो या उसके टुकड़े करो,
तुम मानो अपना शत्रु या अंतर में भरो,
अन्त नहीं कहता कि मैत्री नहीं तुमसे,
कि अन्त अनीत हैं और तुम उससे लड़ो ॥

अन्त की भी क्या अभिलाषा हैं,
अन्त ही अन्त की भाषा हैं ॥

अन्त विध्वंश नहीं, अन्त सृजन श्रोत हैं,
अन्त मृत्यु नहीं, अन्त जीवन ज्योत हैं,
अन्त इस नश्वर जग का अमर सोच हैं,
अन्त दिव्य निनाद हैं, अन्त पावन मोक्ष हैं ॥
अन्त की भी क्या प्रत्याशा हैं,
अन्त ही अन्त की आशा हैं ॥

अन्त स्वयं नहीं आता, उसे बुलाते हो तुम,
अन्त अनभिज्ञ, उसे मार्ग दिखाते हो तुम,
अच्छे-बुरे कर्मों का लेख लिखाते हो तुम,
क्यों खेद तुम्हें? अन्त को अन्त बनाते हो तुम ॥

अन्त की भी क्या जिज्ञाषा हैं,
अन्त ही अन्त की भाषा हैं ॥

अन्त निरंतर, अन्त शाश्वत, अन्त विधान हैं,
अन्त अजेय, अन्त सर्वज्ञ, अन्त-हीन ज्ञान हैं,
भेद नहीं किसी के अन्त में, अन्त विज्ञानं हैं,
सत्य वचन हैं, हर मानव का अन्त महान हैं ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी