Uske Ghar Tum

Posted: मई 17, 2016 in Uncategorized
उसके घर तुम कभी नहीं जाना, वो ईमान पूजता हैं,
वो न अल्लाह, वो न ईसा को, वो न राम पूजता हैं ।
 
वो बेनसीब, वो हैं हारा-भटका, वो आराम ढूँढ़ता हैं,
हम सब जाने अपने रस्ते-मंजिल, वो नाकाम ढूँढ़ता हैं ।
 
मिट्टी ही उसको चाँदी-सोना, वो न दाम देखता हैं,
हम ज़रदारी, हम व्यापारी, वो तमाम बेचता हैं ।
 
मात मिले या जीत हो हासिल, वो मक़ाम सोचता हैं,
सबकी चाहत उम्मीद से ज्यादा, वो अंजाम सोचता हैं ।
 
उसका कहीं नहीं आना-जाना, वो सलाम भेजता हैं,
कोई हो मालिक सारे जहां का, वो एहतेराम भेजता हैं । -चन्द्र शेखर तिवारी

Nahi Haar

Posted: अप्रैल 12, 2016 in Uncategorized

नहीं हार, नहीं हार, तू जीवन-रण ना हार,
सूरज लाख तपे भूमि से, नहीं सके हैं जार,
नहीं हार, नहीं हार, तू देख नदी जलधार,
पर्वत लाख काटे सरि-पथ, रोक सके ना धार।

नहीं हार, नहीं हार, तू जीवन-पथ ना डार,
सागर बढ़े कोटि-कोटि डग, फिर भी मिले किनार,
नहीं हार, नहीं हार, तू धीरज कभी ना टार,
मौन रह कई माह पात बिन, पतझड़ बने बहार।

नहीं हार, नहीं हार, तू लक्ष्य कभी ना हार,
प्रति-पल प्रति-क्षण पथ में तत्पर, धरती लिए हैं भार,
नहीं हार, नहीं हार, तू तोड़ दे भय के द्वार,
नभचर जाने अनंत हैं अम्बर, फिर भी करे हैं पार।

नहीं हार, नहीं हार, तू हर ले उर के अंधार,
विटप न जाने ऊँच-नीच क्या, सब को बाँटे आहार,
नहीं हार, नहीं हार, कर्म हो धर्म का सार,
बादल, पवन, धरती और अम्बर, सबका एक आधार। -चन्द्र शेखर तिवारी

Hum Le Ke Apna

Posted: मार्च 12, 2016 in Uncategorized

हम ले के अपना माल जो मेले में आ गए,
सारे दुकानदार दुकानें बढ़ा गए |

बस्ती के क़त्ले आम पे निकली न आह भी,
ख़ुद को लगी जो चोट तो दरिया बहा गए |

दुनिया की शोहरतें हैं उन्हीं के नसीब में,
अंदाज़ जिनको बात बनाने के आ गए |

फ़नकार तो ज़माने मे गुमनाम ही रहे,
ताजिर थे जो हुनर के ज़माने पे छा गए |

दोनों ही एक जैसे हैं कुटिया हो या महल,
दीवारो दर के मानी समझ में जो आ गए |

नज़रें हटा ली अपनी तो ये मोजजा हुआ,
जल्वे सिमट के ख़ुद मेरी आँखों मे आ गए |

पंडित उलझ के रह गए पोथी के जाल में,
क्या चीज़ है ये ज़िंदगी बच्चे बता गए |

~ हस्तीमल ‘हस्ती’

Maqsad Kuchh Aur Nahi

Posted: फ़रवरी 28, 2016 in Uncategorized

मक़सद कुछ और नहीं बस एक तमाशा खड़ा करना हैं,
हम आज़ाद हैं इस आज़ादी का बियाबां बयां करना हैं ।

करोड़ों के घर रोज़ फाके चले मगर हमें कहाँ लड़ना हैं,
बेवज़ह कहीं जंग-ओ-जदल की फ़र्ज़ पर अड़ा रहना हैं ।

जहाँ मंदिर बने, वहीँ मस्जिद बने, किसे आगे यहाँ बढ़ना हैं,
न भगवान मिले, न अल्लाह मिले, लड़-लड़ कर हमें मरना हैं ।

कई हुजूर हैं हमारे उक़्दो के, अपनी बातों पर कहाँ चलना हैं,
दुसरो की जुबां, दुसरो की दखल, ऐसी आज़ादी में हमें पलना हैं । -चन्द्र शेखर तिवारी

Zindagi Ki Doud Dekhein

Posted: फ़रवरी 7, 2016 in Uncategorized
अब आईये कुछ और देखें,
ज़िन्दगी की दौड़ देखें,
चाहे दुनिया जिस मुताबिक,
आदमी का गौर देखें ॥
 
हर रास्तों के बाद रस्तें,
रास्तों का छोर देखें,
क्या जाने-परखें दायरों को,
बेनाम ही हो मोड़ देखें ॥
 
गलतियों का वज़ूद वाजिब,
खामियों की ओर देखें,
जो सच दबे झूठ की खातिर,
हामियों की ओर देखें ॥
 
हौसलों के साथ रहकर,
मुश्किलों का शोर देखें,
अब साहिलों से दूर जाकर,
आँधियों का ज़ोर देखें ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

Ab In Houslon Ke Shakh

Posted: नवम्बर 15, 2015 in Uncategorized
अब इन हौसलों के शाख काट कर फेंक दो,
नये शाख निकलेंगे तो शायद कोई सबक होगा,
बरसों से दिये और मोम जलकर राख हुए हैं,
ये सोचकर कि हवाओं में सुकून का महक होगा ।

कि दीवारों और चट्टानों से बचाव मुमकिन नहीं,
जब वक़्त के गुनाहों का ये दरिया समन्दर होगा,
अपने नक़ाब निकाल फेंको कि वो दिन दूर नहीं,
जब जुल्म के तूफानों का राह-बार सिकन्दर होगा ।

वो जो भड़कते हैं सिर्फ अपनों का खून देखकर,
वो बताये तो आखिर मुर्दों का क्या वतन होगा,
मौत किसी की हो, जुल्म की वही निशानी हैं,
इस तरह आपस में बँटवारे से क्या अमन होगा ।

अब आवाज़ ही सही, पर कुछ तो एक सा मिले,
कि मिन्नतों और दुवाओं का कोई तो असर होगा,
अब चींख किसी की हो, सबका दिल एक सा हिले,
किसी मासूम के अरमानों का कँही तो बसर होगा ।  -चन्द्र शेखर तिवारी

Phir Koi Ummeed Bane

Posted: नवम्बर 8, 2015 in Uncategorized

फिर कोई उम्मीद बने, हौसला दराज़ मुमकिन हो,
ख़ल्क़ से दौर चले, रात के आखिर फिर दिन हो।

फिर एक तारीख बने, रंज-ओ-तक़सीम मुश्किल हो,
कारवां फिर से चले, हर एक मोड़ अब मंज़िल हो।

हर तरफ ईमान रहे, फिर चैन-ओ-अमन शामिल हो,
मात पर भी फक्र रहे, अब जीत कुछ यूँ हासिल हो।

दुवाओं में जोर रहे, पर दैर-ओ-हरम न हाकिम हो,
गीता संग कुरान रहे ,सब इंसानियत के खादिम हो। -चन्द्र शेखर तिवारी