Dekho toot raha hain taara

Posted: नवम्बर 20, 2010 in Uncategorized

देखो, टूट रहा हैं तारा !

नभ के सीमाहीन पटल पर ,
एक चमकती रेखा चलकर ,
लुप्त शून्य में होती, बुझता एक निशा का दीप दुलारा !
देखो, टूट रहा हैं तारा !

हुआ न उड्डगण में क्रंदन भी ,
गिरे न आंसू के दो कण भी ,
किसके उर में आह उठेगी, होगा जब लघु अंत हमारा !
देखो, टूट रहा हैं तारा !

यह परवशता या निर्ममता ?
निर्बलता या बळ कि क्षमता ?
मिटता एक, देखाता रहता, दूर खड़ा तारक-दल सारा !
देखो, टूट रहा हैं तारा !

– हरिवंश राय बच्चन

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