Ab aksar chup chup se rahe hain

Posted: मार्च 5, 2011 in Uncategorized

अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं यूं ही कभू लब खोले हैं,
पहले “फिराक” को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं|

दिन में हम को देखने वालो अपने-अपने हैं औकात,
जाओ न तुम इन खुश्क आँखों पर हम रातों को रो ले हैं|

फितरत मेरी इश्क-ओ-मुहब्बत किस्मत मेरी तन्हाई,
कहने की नौबत ही न आई हम भी कसू के हो ले हैं|

बाग़ में वो ख़्वाब-आवार आलम मौज-ए-सबा के इशारों पर,
डाली-डाली नौरस पत्ते सहस सहज जब डोले हैं|

उफ़ वो लबों पर मौज-ए-तबस्सुम जैसे करवटें ले कौंदें,
हाय वो आलम जुम्बिश-ए-मिज़ागान जब फितने पर तोले हैं|

इन रातों को हारीम-ए-नाज़ का इक आलम होए है नादीम,
खलवत में वो नर्म उंगलियाँ बंद-ए-काबा जब खोले हैं|

ग़म का फ़साना सुनने वालो आखिर-ए-शब् आराम करो,
कल ये कहानी फिर छेड़ेंगे हम भी ज़रा अब सो ले हैं|

हम लोग अब तो पराये से हैं कुछ तो बताओ हाल-ए-“फिराक”,
अब तो तुम्हीं को प्यार करे हैं अब तो तुम्हीं से बोले हैं|

–“फिराक” गोरखपुरी उर्फ़ रघुपति सहाय

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