Meri Shayari 2.4

Posted: मई 8, 2011 in Uncategorized

1.
उस फटे-पुराने आँचल की ,
‘जिंदा’ कहें तू मोल न जाने ,
तेरे लाखों के कपड़े कुछ भी नहीं,
चाहे सोने का तू घोल लगा ले !! -ABZH

2.
ठहरा नहीं वो शबनम का कतरा,
पत्ता-पत्ता रोया था उस दिन,
तूफ़ान भी आया बादल भी गरजा,
रस्ता-रस्ता खोया था उस दिन !! -ABZH

3.
एक बात कह कर मुक़र गए वो,
आज भी सोचता हूँ वो बात क्या थी !! -ABZH

4.
कमबख्त ‘जिंदा’ भी देख सकता था नज़ारे इस जहां के,
कि अश्कों के दर्पण में आज भी एक चेहरा खामोश दिखाई देता हैं !! -ABZH

5.
बातों को बातें ही रहने दो,
उसे जज्बातों से न जोड़ों ,
कि दिल टूटा हुआ भी धड़केगा,
उसे हर मोड़ो पर न तोड़ों !! -ABZH

6.
तो जाओ तुम किसी सरोवर के ठहरे जल से पूछो ठहराव क्या होता हैं ,
उद्गम के निकट किसी नदी की जल धारा से पूछो बहाव क्या होता हैं,
इस मतलबी दुनिया से बोझिल धरती से पूछो दबाव क्या होता हैं,
और किसी टूटे हुए दिल के अंतर से पूछो प्यार में इम्तिहां क्या होता हैं !!
-ABZH

7.
कि वो शाम आज भी अधुरा हैं,
ये चाँद आया था कहने ,
वो बात आज भी कहाँ पूरा हैं,
कि दर्द और भी हैं सहने !! -ABZH

8.
पीछे खड़े रह गए,
जीना न आया हमें,
अश्क बहते रह गए,
पीना न आया हमें !! -ABZH

9.
ऐसे मुस्तकबिल में ज़ख्म तो मौत वाले भी झेलने हैं हमें,
कि उसके इंतजार वाले ज़ख्मों के सितम ही क्या कम थे !! -ABZH

10.
कभी-कभी चाहतों के समंदर में, एक छोटी सी आरज़ू की कश्ती को साहिल तक पहुँचने की मुसर्रत नहीं होती|
खैर, उसका सफ़र अधुरा ही रह जाता हैं| फिर तो वो सिर्फ किसी की जुस्तजू में डूबने की चाहत रखता हैं,
मगर उसे इतनी भी चाहत नसीब नहीं होती कि वो उस समंदर में डूब सके|
हाँ, यकीन तो नहीं होता, पर कमबख्त किसी की जुस्तजू की गहराई इतनी भी हो सकती हैं !!
-ABZH

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