Meri Shayari 3.7

Posted: अप्रैल 14, 2012 in Uncategorized

1.
लम्हों के इस जहां में जुबान वालों की कोई कमी नहीं,
कि ऐ खुदा, आखिर तुने उसे अकेले बेजुबान क्यों बनाया !! -ABZH

2.
फिर वही दिल-साजी,
फिर वही जन्नत-ए-जूनून,
हमें पता हैं आज क्यों शमा खुद चल कर परवाने के पास आया हैं !! -ABZH

3.
कि धुआँ भी न निकला कुछ जले हम यूँ राख तक,
क्यों शिकायत पेड़ों को अक्सर पत्तों से ही रहती हैं जो टूटा करते हैं शाख तक !! -ABZH

4.
कि फतह हासिल करनी हैं तो मौत का करो,
कमबख्त ! ये इंसानी कुब्बत जिन्दों पर ही अपना ज़ोर जाया करती आई हैं !! -ABZH

5.
इस ज़मीन को क्यों ज़न्नत,
कहते नहीं हम,
कि यहाँ कौन हैं जिंदा,
जिसको नहीं गम !! -ABZH

6.
मिन्नत मेरी बदनाम हुई,
सुबह तेरी, मेरी शाम हुई,
मगर याद रखना हम हैं मुसाफिर,
कि कब ये दुनिया किसी के नाम हुई !! -ABZH

7.
ज़िन्दगी को मुसाफिर की तरह आजमाते हैं,
चलो एक बार फिर दर्द-ए-जहन फरमाते हैं !! -ABZH

8.
हौसले बुझ गए,
ख्वाहिशें रेत से उड़ गए,
मेरे हसरतों के दायरे,
सिलसिलों के लम्हों के समंदर में खो गए !! -ABZH

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