Drishtant

Posted: जुलाई 29, 2013 in Uncategorized

नभ में बादल फिर नहीं छाएँ,
मौन पवन भी कुछ नहीं गाये,
अव्यक्त रही मन की इच्छाएँ,
ज्यों मिटती गई स्मृति रेखाएँ ॥

स्थिर रहे अश्रू-कण नेत्र में कैसे,
ह्रदय बने सहिष्णु भेद में कैसे,
किंचित स्वार्थ स्नेह आलम्ब हैं,
स्नेह का दर्पण अबोध हो जैसे ॥

पुहुप मुस्काएं तो भी ऋणी हैं,
पुहुप मुरझाएं तो भी ऋणी हैं,
सूर्य,पवन,जल और मिट्टी का,
मधुप के श्रम और सृष्टि का ॥

जल हो खारा या हो कारा,
उसमे जीना तो जलचर जाने,
नभ में गर्जन हो या हो तूफां,
उसमे उड़ना तो नभचर जाने ॥

रत्नाकर स्वयं रत्न न जाने,
मनुज करे तप रत्न को लाने,
स्वार्थ नहीं ये क्षुधा कलंक हैं,
सभी हैं राजा मनुज ही रंक हैं ॥

दृग ले निर्णय तो ह्रदय का क्या?
निश्छल प्रेम तो विजय का क्या?
प्रेम समर्पित तो उलट-फेर क्या?
प्रेम अपूर्ण तो परिचय का क्या?

सूरज व्याकुल अस्त दिशायें,
अनृत ही रजनी शोर मचायें,
भोर की किरणें विकिरित होंगी,
पुनः लेकर जीवन की आशाएँ ॥

-चन्द्र शेखर तिवारी

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