Sarwaswa Daan

Posted: दिसम्बर 8, 2013 in Uncategorized

रश्मिरथी – चतुर्थ सर्ग के चुने अंश (रामधारी सिंह ‘दिनकर’) :

नरता का आदर्श तपस्या के भीतर पलता हैं,
देता वही प्रकाश, आग में जो अभीत जलता हैं।
आजीवन झेलते दाह का दंश वीर-व्रतधारी,
हो पाते तब कहीं अमरता के पद के अधिकारी।

प्रण करना हैं सहज, कठिन हैं लेकिन, उसे निभाना,
सबसे बड़ी जाँच हैं व्रत का अंतिम मोल चुकाना।
अंतिम मूल्य न दिया अगर, तो और मूल्य क्या?
करने लगे मोह प्राणों का-तो फिर प्रण लेना क्या?

सस्ती कीमत पर बिकती रहती जबतक कुर्बानी,
तबतक सभी बने रह सकते हैं त्यागी, बलिदानी।
पर, महँगी में मोल तपस्या का देना दुष्कर हैं,
हँस कर दे यह मूल्य, न मिलता वह मनुष्य घर-घर हैं।

जीवन का अभियान दान-बल से अजस्र चलता हैं,
उतनी बढ़ती ज्योति, स्नेह जितना अनल्प जलता हैं।
और दान में रोकर या हँस कर हम जो देते हैं,
अहंकारवश उसे स्वत्व का त्याग मान लेते हैं।

यह न स्वत्व का त्याग,दान तो जीवन का झरना,
रखना उसको रोक मृत्यु के पहले ही मरना हैं।
किस पर करते कृपा वृक्ष यदि अपना फल देते हैं?
गिरने से उसको सँभाल क्यों रोक नहीं लेते हैं?

ऋतु के बाद फलों का रुकना डालों का सड़ना हैं,
मोह दिखाना देय वस्तु पर आत्मघात करना हैं।
देते तरु इसलिए कि रेशों में मत कीट समायें,
रहें डालियाँ स्वस्थ और फिर नये-नये फल आयें।

सरिता देती वारि कि पाकर उसे सुपूरित घन हो,
बरसे मेघ, भरे सरिता, उदित नया जीवन हो।
आत्मदान के साथ जग्गजीवन का ऋजु नाता हैं,
जो देता जितना बदले में उतना ही पाता हैं।

दिखलाना कार्पण्य आप अपने धोखा खाना हैं,
रखना दान अपूर्ण रिक्त निज का ही रह जाना हैं।
व्रत का अन्तिम मोल चुकाते हुए न जो रोते हैं,
पूर्ण-काम जीवन से एकाकार वही होते हैं।

जो नर आत्मदान से अपना जीवन-घट भरता हैं,
वही मृत्यु के मुख में भी पड़कर न कभी मरता हैं।
जहाँ कहीं हैं ज्योति जगत में, जहाँ कहीं उजियाला,
वहाँ खड़ा हैं कोई अन्तिम मोल चुकानेवाला।

व्रत का अन्तिम मोल राम ने दिया, त्याग सीता को,
जीवन कि संगिनी, प्राण की मणि को, सुपुनीता को,
दिया अस्थि देकर दधीचि ने, शिवि ने अंग क़तर कर,
हरिश्चंद्र ने कफ़न माँगते हुए सत्य पर अड़ कर।

ईसा ने संसार-हेतु शूली पर प्राण गवाँ कर,
अन्तिम मूल्य दिय गांधी ने तीन गोलियाँ खाकर।
सुन अन्तिम ललकार मोल माँगते हुए जीवन की,
सरमद ने हँस कर उतार दी त्वचा समूचे तन की।

हँस कर लिया मरण ओंठों पर, जीवन का व्रत पाला,
अमर हुआ सुकरात जगत में पीकर विष का प्याला।
मर कर भी मनसूर नियति की सह न पाया ठिठोली,
उत्तर में सौ बार चीख कर बोटी-बोटी बोली।

दान जगत का प्रकृत धर्म हैं, मनुज व्यर्थ डरता हैं,
एक रोज तो हमें स्वयं सब-कुछ देना पड़ता हैं।
बचते वहीं, समय पर जो सर्वस्व दान करते हैं,
ऋतु का ज्ञान नहीं जिनको, वे देकर भी मरते हैं।

-रामधारी सिंह ‘दिनकर’

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