Umr Jalwon Mein Basar Ho

Posted: जनवरी 5, 2014 in Uncategorized

उम्र जलवों में बसर हो, ये ज़रूरी तो नहीं
हर सब-ए-ग़म की सहर हो, ये ज़रूरी तो नहीं ॥

चश्म-ए-साक़ी से पियो, या लब-ए-सागर से पियो,
बेखुदी आठों पहर हो, ये ज़रूरी तो नहीं ॥

नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती हैं,
उनकी आगोश में सर हो, ये ज़रूरी तो नहीं ॥

शेख करता तो हैं मस्जिद में खुदा को सजदे,
उसके सजदों में असर हो, ये ज़रूरी तो नहीं ॥

सब की नज़रों में हो साक़ी ये ज़रूरी हैं मगर,
सब पे साक़ी की नज़र हो, ये ज़रूरी तो नहीं ॥ -खामोश ग़ाज़ीपुरी

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