Silsila Aur Bhi Kuchh

Posted: जनवरी 9, 2014 in Uncategorized

सिलसिला और भी कुछ ग़म का बनाया जाये,
इस बियाबां को समंदर से मिलाया जाये ॥

मेरी रातों ने तराशे हैं जो ख्वाबो के बदन,
उनके ख्वाबों में कोई चेहरा तो लगाया जाये ॥

जिस में हम लोग चिरागों की तरह जलते हैं,
आओ वो शहर ज़माने को दिखाया जाये ॥

अपने क़ब्ज़े में तो ज़ख्मों की बड़ी दौलत हैं,
क्यों न फिर वक़्त का सब क़र्ज़ चुकाया जाये ॥

दिल में इस क़द्र तेरे दर्द को रख लेता हूँ,
जैसे घर में किसी मुजरिम को छुपाया जाये ॥

मुझ से खुद अपना पता पूछ रहा था इक दिन,
हाय वो शख्स भुलाये न भुलाया जाये ॥

मैं कोई राज़ की तहरीर नहीं हूँ ‘जामी’,
बंद कमरे में जिसे ला के जलाया जाये ॥ -खुर्शीद अहमद ‘जामी’

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