Husn Ghamze Ki Kashaakash Se Chhuta

Posted: जनवरी 25, 2014 in Uncategorized

हुस्न ग़मज़े की कशाकश से छूटा मेरे बाद,
बारे आराम से हैं अहल-ए-जफ़ा मेरे बाद ||

शम्मा बुझती हैं तो उसमें से धुआं उठता हैं,
शोला-ए-इश्क़ सियाह-पॉश हुआ मेरे बाद ||

मनसब-ए-शफ्तगी के कोई क़ाबिल न रहा,
हुई माजुली-ए-अंदाज़-ओ-अदा मेरे बाद ||

दरख़ुर-ए-अर्ज़ नहीं, जौहर-ए-बेदाद को जा,
निगाह-ए-नाज़ हैं सुरमे से खफा मेरे बाद ||

हैं जूनून अहल-ए-जूनून के लिए आग़ोश-ए-विदा,
चाक होता हैं गिरेबान से जुदा मेरे बाद ||

ग़म से मरता हूँ कि इतना नहीं दुनिया में कोई,
कि करे ताज़ियत-ए-मेहर-ओ-वफ़ा मेरे बाद ||

आये हैं बेक़सी-ए-इश्क़ पे रोना ग़ालिब,
किसके घर जाएगा सैलाब-ए-बला मेरे बाद ॥ -मिर्ज़ा ग़ालिब

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