Gantantra Divas Aur Aam Mat-Daata

Posted: जनवरी 26, 2014 in Uncategorized

गणतंत्र दिवस का महत्व धीरे-धीरे वार्षिक के साथ-साथ एक दिवसीय हो चूका हैं। बाकी के ३६४ दिन हमारे देश की गणतंत्रता आम आदमी के लिए कितनी सक्रिय हैं, इसके ऊपर अगर कोई सवाल खड़ा कर दे तो यह गलत नहीं होगा। हर चीज में आज कल राजनीतिकरण का खेल चल रहा हैं। सारे राजनीतिक दल मिल-बाँट कर इस गणतंत्र को पिछले ६४ वर्षों से बचाये रखने का श्रेय भी ले रहे हैं। आज तो राजनीति करनेवाले, एक आम आदमी को यह कह ही सकते है :
कि चाहे तुम किसी भी राह में चलो, यहाँ हर कारवां हमारा हैं ॥

अब बात जो भी हो इस गणतंत्र को एक आम आदमी ही चुनता हैं और हर पांच वर्ष के बाद ये अवसर उसे दिया जाता हैं। बात यह नहीं हैं कि एक आम मतदाता हर पाँच वर्षों में मिलनेवाली अपना एक दिवसीय मत आखिर किसे दे? कांग्रेस या बीजेपी या आप जैसी युवा पीढ़ी की एक कम अनुभवी और नवीन युगांतकारी दल या फिर कोई क्षेत्रीय दल ? बात यह हैं कि अगर वो मत उस दल को सीधे जाती हैं जिसे बहुमत नहीं भी हो पर सर्वाधिक स्थानों पर विजय मिलती हैं, तब दिल्ली में इस साल सांझे की संघ परिवार वाली सरकार नहीं आएगी फल-स्वरूप एक दलवाली सरकार का गठन सम्भव होगा और भविष्य में अगर कोई भी ऐसा राजकीय कार्य प्रकाश में आता हैं जिससे भ्रष्टाचार और दुर्नीति का बोध हो, तब आपके सामने एक दल प्रत्यक्ष मिलती हैं जिसे उत्तरदायित्व लेना पड़ता हैं और एक ही स्वर में हम सब सरकार पर आरोप लगा सकते हैं। जिससे कोई छिपने और छिपाने वाली बात नहीं रह जाती हैं और आनेवाले चुनाव में जनता अपनी फैसला दृढ़ता से ले पाती हैं। 

अब इसमें अगर किरण वेदी जी मोदी का समर्थन करती हैं , या फिर आदरणीय प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह जी कांग्रेस में रुके रहते हैं या फिर कप्तान गोपीनाथ सर जैसे बुद्धिजीव और मेधा पाटकर जैसी समाज-सेवी, केजरीवाल पर मुहर लगाने को कहते हैं तो कोई समस्या की बात नहीं हैं। जब तक अंत में उनका मत उस दल को जाता हैं जो सर्वाधिक स्थानों पे विजय हासिल करती हैं तब तक मुझे कोई गलत बात नहीं लगती। सरकार स्थायी हो और देश का काम तेजी से आगे बढे तो किसी को क्या समस्या हो सकती हैं, सिवाय इसके कि आपकी विचारधारा और सरकार की विचारधारा में मेल नहीं हो। मेरा मानना हैं कि देश का स्थान पहले और फिर आपकी विचारधारा आती हैं। इतिहास ने ऐसे कितने अवसर देखे हैं जहाँ वीरों ने अपनी विचारधारा से बढ़ कर ऐसा कार्य किया हैं जिससे देश का हित हो। अगर ऐसा नहीं होता तो आज चाणक्य और चन्द्रगुप्त की वो ऐतिहासिक कड़ी नहीं होती, न ही रामायण एक महाकाव्य बना होता जिसमे कैकेयी की वो भूमिका होती जिससे श्री राम चन्द्र को अयोध्या छोड़कर १४ वर्षों का वनवास लेना पड़ता, न ही वेदव्यास जी महाभारत जैसा महाकाव्य लिख पाये होते जिसमे गंगा पुत्र भीष्म के महा-प्रण लेने उपरांत धृतराष्ट्र ने अपने विचारधारा को महान मान हस्तिनापुर की राजगद्दी सम्भाली और न ही हमें गीता जैसा धर्म-ग्रन्थ मिला होता जिसमे भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को यही बात समझाने के लिए गीता का उवाच किया । 

मत देश के विकाश में अग्रसर हो और किसी की अपनी विचारधारा उस व्यक्ति विशेष के विकाश में अग्रसर हो, तो ज्यादा न्यायसंगत जान पड़ता हैं। बाकी आपकी पूरी बनती हैं कि यह निर्णय ले कि आप किसे मत देंगे। आप एक स्थायी और विकाश हेतु स्पष्ट और जल्द फैसले लेनेवाली सरकार चाहेंगे या फिर अपनी विचारधारा पर सवार हो एक बहु-दलीय सांझे वाली सरकार जिसे हम पिछले कई दशकों से झेलते आये हैं। जय हिन्द। 

-चन्द्र शेखर तिवारी

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