Tum Mujhme Ho

Posted: फ़रवरी 2, 2014 in Uncategorized

तुम मुझमें हो या मैं तुममें हूँ,
ये निर्णय आज नहीं होगा,
जाने ह्रदय अयान किस पल,
कब परिणय ताज नहीं होगा ॥

कलियों की भाषा मत सीखों,
तुम हठ करते हो शूल बनो,
जब काँटों ने प्रतिशोध लिया,
तब तुम कहते हो फूल बनो ॥

जैसे स्वप्न हँसा करते हैं मानो,
नित्य कृत्य के उपवन में,
चन्द्र-कला के विम्ब की भाँति,
निज अंतर-द्वंद्व के दर्पण में ॥

प्रीत किसे दुःख-हीन मिला हो,
किसे राम, किसे रहीम मिला हो,
परिचय-पत्र क्या उस मानव का,
ह्रदय जिसे स्वार्थ-हीन मिला हो ॥

जल-धारों में स्वार्थ जो होता,
वो रह सकती थी बंद घरो में,
गंगा,यमुना,अन्य देव नदियां,
बह सकती थी देव करो में ॥

बादल, सागर, पर्वत, अम्बर,
ये स्वार्थ-सुधा तज उन्मुक्त हैं,
कि तुम मुझमें हो या मैं तुममें हूँ,
ये प्रश्न कहाँ तक उपयुक्त हैं ॥

कब तुमने सोचा भाव-विधि से,
प्रिय, तुम मुझमें हो रिक्त-निधि से,
कभी संतृप्त नहीं ये मन होता हैं,
तुम चाहे सोचो दिव्य-विधि से ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

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