Jo Punya-Punya Bak Rahe

Posted: फ़रवरी 9, 2014 in Uncategorized

(परशुराम की प्रतीक्षा, खण्ड पांच के चुने अंश) :

जो पुण्य-पुण्य बक रहे, उन्हें बकने दो,
जैसे सदियाँ थक चुकीं, उन्हें थकने दो ।
पर, देख चुके हम तो सब पुण्य कमा कर,
सौभाग्य, मान, गौरव, अभिमान गवाँ कर ।

वे पियें शीत, तुम आतप-घाम पियो रे !
वे जपें नाम, तुम बन कर राम जियो रे !

सुर नहीं शान्ति आँसू बिखेर लायेंगे ;
मृग नहीं, युद्ध का शमन शेर लायेंगे ।
विनयी न विनय को लगा टेर लायेंगे,
लायेंगे तो वह दिन दिलेर लायेंगे ।

बोलती बन्द होगी पशु की जब भय से,
उतरेगी भू पर शान्ति छूट संशय से ।

वे देश शान्ति के सब से शत्रु प्रबल हैं,
जो बहुत बड़े होने पर भी दुर्बल हैं,
हैं जिनके उदर विशाल, बाँह छोटी हैं,
भोथरे दाँत, पर, जीभ बहुत मोटी हैं ।

औरों के पाले जो अलज्ज पलते हैं,
अथवा शेरों पर लदे हुए चलते हैं ।

सिंहों पर अपना अतुल भार मत डालो,
हाथियो ! स्वयं अपना तुम बोझ सँभालो ।
यदि लदे फिरे, यों ही, तो पछताओगे,
शव मात्र आप अपना तुम रह जाओगे ।

यह नहीं मात्र अपकीर्ति, अनय की अति हैं ।
जानें, कैसे सहती यह दृश्य प्रकृति हैं !

उद्देश्य जन्म का नहीं, कीर्ति या धन हैं,
सुख नहीं, धर्म भी नहीं, न तो दर्शन हैं ;
विज्ञान, ज्ञान-बल नहीं, न तो चिन्तन हैं,
जीवन का अंतिम ध्येय स्वयं जीवन हैं ।

सब से स्वतन्त्र यह रस जो अनघ पियेगा,
पूरा जीवन केवल वह वीर जियेगा ।

जीवन अपनी ज्वाला से आप ज्वलित हैं,
अपनी तरंग से आप समुद्वेलित हैं ।
तुम वृथा ज्योति के लिए कहाँ जाओगे ?
हैं जहाँ आग, आलोक वहीं पाओगे ।

क्या हुआ, पत्र यदि मृदुल, सुरम्य कली हैं ?
सब मृषा, तना तरु का यदि नहीं बली हैं ।

धन से मनुष्य का पाप उभर आता हैं,
निर्धन जीवन यदि हुआ, बिखर जाता हैं ।
कहते हैं जिसको सुयश-कीर्ति, सो क्या हैं ?
कानों की यदि गुदगुदी नहीं, तो क्या हैं ?

यश-अयश-चिन्तना भूल, स्थान पकड़ो रे !
यश नहीं, मात्र जीवन के लिए लड़ो रे !

कुछ समझ नहीं पड़ता, रहस्य यह क्या हैं !
जानें, भारत में बहती कौन हवा हैं !
गमले में हैं जो खड़े, सुरम्य-सुदल हैं,
मिट्टी पर के ही पेड़ दीन-दुर्बल हैं ।

जब तक हैं यह वैषम्य, समाज सड़ेगा,
किस तरह एक हो कर यह देश लड़ेगा ।

सब से पहले यह दुरित-मूल काटो रे !
समतल पीटो, खाइयाँ-खड्ड पाटो रे !
बहुपाद वटों की शिरा-सोर छाँटो रे !
जो मिले अमृत, सब को सामान बाँटो रे !

वैषम्य घोर जब तक यह शेष रहेगा,
दुर्बल का ही दुर्बल यह देश रहेगा ।

यह बड़े भाग्य की बात ! सिन्धु चंचल हैं,
मथ रहा आज फिर उसे मन्दराचल हैं ।
छोड़ता व्यग्र फूत्कार सर्प पल-पल हैं,
गर्जित तरंग, प्रज्वलित वाडवानल हैं ।

लो कढ़ा जहर ! संसार जला जाता हैं ।
ठहरो, ठहरो, पीयूष अभी आता हैं ।

पर, सावधान ! जा कहो उन्हें समझा कर,
सुर पुनः भाग जाये मत सुधा चुरा कर ।
जो कढ़ा अमृत, सम-अंश बाँट हम लेंगे,
इस बार जहर का भाग उन्हें भी देंगे ।

वैषम्य शेष यदि रहा, क्षान्ति डोलेगी,
इस रण पर चढ़ कर महा क्रान्ति बोलेगी । -रामधारी सिंह ‘दिनकर’

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