Raasta To Chale

Posted: नवम्बर 17, 2014 in Uncategorized

खार-ओ-खस तो उठें, रास्ता तो चले,
मैं अगर थक गया, काफ़ला तो चले |

चांद, सूरज, बुजुर्गों के नक्श-ए-क़दम,
खैर बुझने दो उनको हवा तो चले |

हाकिम-ए-शहर, यह भी कोई शहर है,
मस्जिदें बंद हैं, मैकदा तो चले |

उसको मज़हब कहो या सिआसत कहो!
खुद्कुशी का हुनर तुम सिखा तो चले |

इतनी लाशें मैं कैसे उठा पाउँगा,
आप ईंटों की हुरमत बचा तो चले |

बेल्चे लाओ, खोलो ज़मीन की तहें,
मैं कहाँ दफ़न हूँ, कुछ पता तो चले | -कैफ़ी आज़मी

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