Ye Nazmon Mein Meri Wazah Dhundhte Hain

Posted: दिसम्बर 12, 2014 in Uncategorized

ये नज़्मों में मेरी वज़ह ढूँढ़ते हैं,
खुद के दिलों में जगह ढूँढ़ते हैं,
हया-दार होकर सबब ढूँढ़ते हैं,
बे-अदब खुद हैं अदब ढूँढ़ते हैं ॥

अपने ही शहर में शहर ढूँढ़ते हैं,
बेगानों के जैसे नज़र ढूँढ़ते हैं,
मुहब्बत में अपनी ज़हर ढूँढ़ते हैं,
इबादत नहीं पर असर ढूँढ़ते हैं ॥

ये पायाबियों में लहर ढूँढ़ते हैं,
राह-ओ-डगर में ठहर ढूँढ़ते हैं,
सहरा-ओ-सहरा बसर ढूँढ़ते हैं,
अपनों के दर पे बदर ढूँढ़ते हैं ॥

ये रक़ीबों के जैसे जिगर ढूँढ़ते हैं,
बेफिक्री में कैसी फिकर ढूँढ़ते हैं,
सितारों से ऊँचें शिखर ढूँढ़ते हैं,
मंज़िल मिले तो सिफर ढूँढ़ते हैं॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

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