Ab Mat Mera Nirman Karo

Posted: दिसम्बर 23, 2014 in Uncategorized

अब मत मेरा निर्माण करो!

तुमने न बना मुझको पाया,
युग-युग बीते, मैं न घबराया;
भूलो मेरी विह्वलता को,
निज लज्जा का तो ध्यान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो!

इस चक्की पर खाते चक्कर,
मेरा तन-मन-जीवन जर्जर;
हे कुंभकार, मेरी मिट्टी को,
और न अब हैरान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो!

कहने की सीमा होती है,
सहने की सीमा होती है;
कुछ मेरे भी वश में,
मेरा कुछ सोच-समझ अपमान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो!

-हरिवंशराय बच्चन

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