Jhuth-jhuth bol kar

Posted: फ़रवरी 8, 2015 in Uncategorized

झूठ-झूठ बोल कर, हो रही हैं हरकतें,
झूठ-झूठ बोल कर, बरकतें ही बरकतें ।

जुबां से बोलता नहीं, आँख बंद हैं पड़ी,
आसमां के वास्ते, ज़मीं पे मुश्किलें बढ़ी ।

वाह ! कैसी ज़िन्दगी, आदमी को चाहिए,
दाल-रोटी अब नहीं, हार-मोती चाहिए ।

हैं बड़ा वो आदमी, कितना आलिशान हैं,
जितना ऊँचा हैं खड़ा, उतना बेईमान हैं ।

अब नया उसूल हैं, सच कहा तो भूल हैं,
झूठ खुशबूदार हैं, मुंह से निकला फूल हैं । -चन्द्र शेखर तिवारी

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