Aasha Ka Deepak

Posted: अप्रैल 12, 2015 in Uncategorized

आशा का दीपक :

यह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है,
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है|

चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से,
चमक रहे पीछे मुड़ देखो चरण-चिन्ह जगमग से|
शुरू हुई आराध्य भूमि यह क्लांत नहीं रे राही;
और नहीं तो पाँव लगे हैं क्यों पड़ने डगमग से|

बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है,
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है|

अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का,
सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश निर्मम का।
एक खेप है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ;
वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का।

आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा,
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही;
अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।

और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है,
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है। -रामधारी सिंह “दिनकर”

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