Main Is Ummeed Pe Dooba

Posted: अप्रैल 27, 2015 in Uncategorized

मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा,
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा ॥

यह एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा,
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा ॥

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा,
कोई चिराग नहीं हूँ जो फिर जला लेगा ॥

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए,
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा ॥

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे,
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा ॥

हज़ार तोड़ के आ जाऊं उस से रिश्ता “वसीम”,
मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा ॥ – वसीम बरेलवी

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