Phir Vikal Hain Pran Mere

Posted: जून 6, 2015 in Uncategorized

**—- छप्पन : यामा (महादेवी वर्मा) —-**

फिर विकल हैं प्राण मेरे !
तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूँ उस ओर क्या हैं !
जा रहे जिस पंथ से युग कल्प उसका छोर क्या हैं ?
क्यों मुझे प्राचीर बन कर आज मेरे श्वास घेरे ?

सिन्धु की निःसीमता पर लघु लहर का लास कैसा !
दीप लघु शिर पर धरे आलोक का आकाश कैसा !
दे रही मेरी चिरन्तनता क्षणों के साथ फेरे !

बिम्बग्राहकता कणों को शलभ को चिर साधना दी,
पुलक से नभ भर धरा को कल्पनामय वेदना दी;
मत कहो हे विश्व ! ‘झूठे हैं अतुल वरदान तेरे’ !

नभ डुबा पाया न अपनी बाढ़ में भी क्षुद्र तारे,
ढूँढने करुणा मृदुल घन चीर कर तूफ़ान हारे;
अन्त के तम में बुझे क्यों आदि के अरमान मेरे !

-महादेवी वर्मा

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