Ant

Posted: जून 27, 2015 in Uncategorized

अन्त की भी क्या परिभाषा हैं,
अन्त ही अन्त की आशा हैं ॥

तुम उससे भागो या उसके टुकड़े करो,
तुम मानो अपना शत्रु या अंतर में भरो,
अन्त नहीं कहता कि मैत्री नहीं तुमसे,
कि अन्त अनीत हैं और तुम उससे लड़ो ॥

अन्त की भी क्या अभिलाषा हैं,
अन्त ही अन्त की भाषा हैं ॥

अन्त विध्वंश नहीं, अन्त सृजन श्रोत हैं,
अन्त मृत्यु नहीं, अन्त जीवन ज्योत हैं,
अन्त इस नश्वर जग का अमर सोच हैं,
अन्त दिव्य निनाद हैं, अन्त पावन मोक्ष हैं ॥
अन्त की भी क्या प्रत्याशा हैं,
अन्त ही अन्त की आशा हैं ॥

अन्त स्वयं नहीं आता, उसे बुलाते हो तुम,
अन्त अनभिज्ञ, उसे मार्ग दिखाते हो तुम,
अच्छे-बुरे कर्मों का लेख लिखाते हो तुम,
क्यों खेद तुम्हें? अन्त को अन्त बनाते हो तुम ॥

अन्त की भी क्या जिज्ञाषा हैं,
अन्त ही अन्त की भाषा हैं ॥

अन्त निरंतर, अन्त शाश्वत, अन्त विधान हैं,
अन्त अजेय, अन्त सर्वज्ञ, अन्त-हीन ज्ञान हैं,
भेद नहीं किसी के अन्त में, अन्त विज्ञानं हैं,
सत्य वचन हैं, हर मानव का अन्त महान हैं ॥ -चन्द्र शेखर तिवारी

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s