Suna Hain

Posted: जुलाई 22, 2015 in Uncategorized

सुना हैं कि ज़ंजीरें चलती हैं !
हाँ ! किसी मासूम के गले से जेल के उस घर तक,
जहाँ क़ानून के अँधेरे में उसकी बेगुनाही की वजह ढूँढती हैं ।

सुना हैं कि लकीरें जलती हैं !
हाँ ! किसी बदकिस्मत इंसान की दायीं हथेली पर,
क़र्ज़ में डूबे किसी किसान की खेतों में उसकी राख मिलती हैं ।

सुना हैं कि ज़मीरें मरती हैं !
हाँ ! किसी पत्थर दिल में उसकी दीवारों से दबकर,
इंसाफ की झूठी पहचान बनकर तक़सीरी के तख़्त पर बिकती हैं ।

सुना हैं कि सरीरें डरती हैं !
हाँ ! वज़ीरों के महलों से आते सोने-चाँदी के खनक से,
तारीखों में दफ़न होती फरियादों की खामोशियाँ बयां करती हैं । -चन्द्र शेखर तिवारी

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