Kuch Na Kuch Hoga

Posted: जून 7, 2016 in Uncategorized

मेरी जानिब से ग़ैरों ने लगाया कुछ न कुछ होगा,
न आया वो तो उसके जी में आया कुछ न कुछ होगा ।

लड़े है मैकदे में आज जो यूं शीशा – ओ – सागर,
करिश्मा चश्मे-साक़ी ने दिखाया कुछ न कुछ होगा ।

न ढूंढ़ा और न पाया हमने कुछ इस बह् रे-हस्ती में,
वगरना जिसने ढूंढ़ा उसने पाया कुछ न कुछ होगा ।

सुना मैंने कटी उनकी भी सारी रात आँखों में,
किसी ने मेरा अफसाना सुनाया कुछ न कुछ होगा । -बहादुर शाह ‘ज़फ़र’

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